तो इसलिए सभी स्थानीय निकाय चुनाव जीत रही है भाजपा!
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भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली विधानसभा के चुनाव में मिली करारी हार के घाव पर धीरे-धीरे मरहम लग रहा है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के बाद अब बृहत बंगलुरु महानगर पालिका के चुनाव में भाजपा को मिली जीत उसके लिए बडी राहत और विरोधियों के लिए बेचैनी का सबब बनेगी।
पिछले कुछ महीने से लग रहा था कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों की लोकप्रियता घट रही है। लेकिन एक पखवाडे के भीतर तीन राज्यों में जीत के जनादेश का संदेश साफ है कि मतदाताओं का भरोसा अभी टूटा नहीं है।
मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाला, राजस्थान में ललित मोदी से मुख्यमंत्री वसुधरा राजे सिंधिया और उनके बेटे दुष्यंत सिंह के कारोबारी रिश्ते भाजपा के लिए संकट का संकेत दे रहे थे।
नहीं चलने दी संसद
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को संसद में अपनी सफाई पेश करने का मौका
तो मिला। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या पर्याप्त थी और शायद है भी जिनका
मानना है कि उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए था।
विपक्ष ने इन तीनों
नेताओं के इस्तीफे की मांग पर संसद का मानसून सत्र चलने नहीं दिया। विपक्ष
इस बात पर अडा रहा कि इस्तीफा नहीं तो चर्चा नहीं और प्रधानमंत्री अडे रहे
कि इस्तीफा तो नहीं ही होगा।
ऐसा लग रहा था कि भाजपा के लिए यह दांव उल्टा
पडेगा। इस दौरान विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अहंकारी और
मौनेंद्र मोदी की संज्ञा भी दी।
जनता का फैसला माना जाए?
जनतांत्रिक व्यवस्था में दो प्रकार की न्याय
व्यवस्था काम करती है।कानून की अदालत में तो कई सीढियां है और फैसले के
खिलाफ अपील के कई मौके। पर जनता की अदालत में दूसरा मौका पांच साल (आम तौर
पर) बाद ही मिलता है।
सवाल है कि इन तीनों चुनावों के नतीजों को किस नजरिए
से देखा जाए। क्या मान लिया जाय कि सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान और
वसुंधरा राजे को मतदाताओं ने सारे आरोपों से बरी कर दिया है?
ऐसा मानना
मतदाता के साथ अन्याय होगा। मतदाता अदालत के फैसले में कोई दखल नहीं देता।
वह एक सीमित दायरे में फैसला देता है।उसका आधार यह होता है कि उसे किसकी
बात ज्यादा विश्वसनीय लगती है। कई बार ऐसा भी होता है कि बात विश्वसनीय न
लगने के बावजूद वह संदेह का लाभ किसी एक पक्ष को दे देता है।
बोफोर्स है उदाहरण!
बोफोर्स घोटाला
इसका सबसे बडा उदाहरण है। किसी भी अदालत के फैसले से पहले मतदाता के
सामूहिक विवेक ने राजीव गांधी को दोषी मान लिया था। स्थानीय निकाय के
चुनावों का यूं तो राष्ट्रीय राजनीति से सीधा संबंध नहीं होता।
लेकिन यह
भारतीय राजनीति का नरेंद्र मोदी काल है।किसी शहर में कैंटोनमेंट बोर्ड की
एक सीट भी भाजपा हार जाए तो उसे मोदी की लोकप्रियता में कमी आने का संकेत
मान लिया जाता है।
ऐसे में भाजपा के नेता अगर यह दावा करें कि यह जीत मोदी
की लोकसभा चुनाव के समय की लोकप्रियता के बरकरार रहने का संकेत हैं तो किसी
को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं
स्थानीय निकाय और पंचायतों के चुनाव अमूमन
स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की छवि के आधार पर लडे और जीते हारे जाते
हैं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इन चुनावों के नतीजों का प्रादेशिक
ही नहीं राष्ट्रीय महत्व भी हो गया है।
जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं
उसी तरह चुनाव नतीजों के भी दो पहलू होते हैं। जो जीता वह क्यों जीता और जो
हारा वह क्यों हारा।मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की जीत को सामान्य
माना जाता अगर व्यापमं घोटाला ओर ललित मोदी कांड न हुआ होता।
इन नतीजों ने
शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे सिंधिया की पेशानियों पर पडे बल और
चेहरे पर चिंता की रेखाओं को मिटा दिया है।
कांग्रेस से बेहतर बुरी भाजपा!
मध्य प्रदेश और राजस्थान के
नतीजे बताते हैं कि शहरों में ही नहीं ग्रामीण अंचल में भी भाजपा की
लोकप्रियता बरकरार है।बृहत बंगलुरु महानगर पालिका में भाजपा की जीत इस
मायने में और अहम हो जाती है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार है।
यह जीत इस
बात का संकेत है कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा के पक्ष में जो माहौल बना
था वह तकरीबन कायम है।इन तीनों चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए खुशखबरी
लेकरकांग्रेस के लिए चिंता की बात यह है कि भाजपा विरोधी माहौल होने के
बावजूद मतदाता उस पर यकीन करने को तैयार नहीं है।
उस राज्य में भी जहां
कांग्रेस सत्ता में है।मतदाता की नजर में कांग्रेस अच्छी भाजपा का तो
विकल्प नहीं ही है। वह बुरी भाजपा के विकल्प के रूप में भी कांग्रेस को
नहीं देखता। आए हैं तो कांग्रेस (तीनों जगहों पर मुख्य विरोधी कांग्रेस ही
थी) को और निराशा की ओर ले जाने वाले।
कांग्रेस की इस हार को चुनाव में होने
वाली सामान्य हार जीत की तरह नहीं लिया जा सकता।कांग्रेस के लिए चिंता की
बात यह है कि भाजपा विरोधी माहौल होने के बावजूद मतदाता उस पर यकीन करने को
तैयार नहीं है। उस राज्य में भी जहां कांग्रेस सत्ता में है।मतदाता की नजर
में कांग्रेस अच्छी भाजपा का तो विकल्प नहीं ही है। वह बुरी भाजपा के
विकल्प के रूप में भी कांग्रेस को नहीं देखता।