'भाजपा प्रचार में हीरो और काम में जीरो'
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विनोद अग्निहोत्री ने कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद से मोदी सरकार के कामकाज से लेकर तमाम राजनीतिक पहलुओं पर बातचीत की। पढ़िए आजाद ने किन मुद्दों पर क्या क्या कहा।
सवाल: केंद्र में मोदी सरकार के सात महीने का कामकाज को कैसे आंकते हैं?
जवाब: वैसे तो सरकार पांच साल के लिए बनती है। लेकिन पूत के पांव पालने में दिखने लगते हैं जिस तरह अधिकारियों की नियुक्ति उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि और प्रतिबद्धता देख कर की जा रही है, वह देश के संवैधानिक ढांचे और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
नौकरशाही को बांटना पूरे प्रशासनिक तंत्र को नष्ट कर देगा। कांग्रेस ने कभी भी यह नहीं देखा कि अधिकारी ने किसके साथ काम किया, किस विचारधारा से है, को तरजीह नहीं दी।
योग्यता और अनुभव को महत्व दिया। लेकिन मोदी सरकार नौकरशाही को भाजपा के प्रति वफादार बनाने में जुटी है, जबकि उसे संविधान, देश और सरकार केप्रति वफादार होनी चाहिए।
इसके अलावा देश के संवेदनशील राज्यों पर भाजपा द्वारा अपनी दादागीरी थोपने का है। जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्य देश के बेहद संवेदनशील इलाके हैं। इसलिए यहां की सियासी आकांक्षाओं की नुमाइंदगी करने वाली इलाकाई पार्टियों को जगह देनी होती है।
सवाल: यह आरोप तो कांग्रेस पर ज्यादा हैं?
जवाब: ऐसा नहीं है। इंदिरा गांधी ने 1975 में जम्मू कश्मीर की अपनी तीन चौथाई बहुमत की सरकार को इस्तीफा दिलाकर शेख अब्दुल्ला जो विधायक भी नहीं थे, की सरकार बनवाई। शेख अब्दुल्ला देश की मुख्यधारा में आ गए।
राजीव गांधी ने मिजोरम में कांग्रेस के मुख्यमंत्री ललथनवाला का इस्तीफा कराकर लाल डेंगा को मुख्यमंत्री बनाकर उनका अलगाववाद खत्म किया। असम समझौता करके असम गण परिषद की सरकार का रास्ता साफ किया।
पंजाब में लोंगोवाल समझौता करके अकालियों को मुख्यधारा में लाए। जबकि भाजपा जम्मू कश्मीर में सबसे बड़ा दल न होने के बावजूद अपनी सरकार और अपना मुख्यमंत्री बनाने का दबाव बना रही है।
प.बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति भी उसका रवैया ठीक नहीं है। भाजपा अभी इसे नहीं समझ रही है, लेकिन इसके नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
सवाल: कांग्रेस सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इससे कैसे उबरेगी?
जवाब: दस बारह सालों में हर पार्टी में ऐसा दौर आता है। 1967, 1977, 1989 और 1996 में पहले भी कांग्रेस हार का दौर देख चुकी है और पार्टी फिर वापस भी लौटी है। यह दौर भी इसी तरह अस्थाई है। कांग्रेस फिर लौटेगी।
सवाल: इस आशावाद की क्या वजह है?
जवाब: लोग बदलाव चाहते हैं इसलिए जब कोई दल या नेता जनता को तमाम सपने और सब्जबाग दिखाता है तो जनता उस पर भरोसा करके उसे चुन लेती है। नई सरकार से उम्मीदें भी ज्यादा होती हैं। मोदी ने बहुत ज्यादा उम्मीदें जगाई हैं।
लोगों ने मान लिया कि जो वह कह रहे हैं, सब सच हो जाएगा। लेकिन मुझे उलटा होता दिखाई दे रहा है। हालांकि सरकार
को अभी सिर्फ छह सात महीने ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह यूपीए सरकार के स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और अन्य सामाजिक क्षेत्रों के कल्याणकारी कार्यक्रमों के बजट में कटौती की जा रही है। 1
3 करोड़ परिवारों यानी करीब 65 करोड़ लोगों के जीवन का आधार बनी मनरेगा योजना ठप पड़ी है। उर्जा उत्पादन की गति मंद हो गई है। कच्चे तेल के दाम जिस हिसाब से गिरे हैं, उसका उतना लाभ लोगों को नहीं मिल रहा है।
इससे लगता है कि महज एक डेढ़ साल में ही जनता का मोदी सरकार से मोहभंग हो जाएगा। तब लोग फिर कांग्रेस की ओर लौटेंगे।
सवाल: क्या कांग्रेस सिर्फ मोदी सरकार की विफलताओं का इंतजार करेगी?
जवाब: कांग्रेस संसद और संसद के बाहर सरकार की विफलताओं, जन विरोधी नीतियों और कोरे वादों के खिलाफ संघर्ष करेगी। भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव,किसानों की बर्बादी, सीमा पार से निरंतर गोलीबारी, जवानों की शहादत, हजारों लोगों का विस्थापन, महंगाई, सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के बजट में कटौती जैसे मुद्दों पर हम जनता के बीच जाएंगे।
सवाल: क्या कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है? राहुल गांधी कब पार्टी की कमान संभालेंगे?
जवाब: सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष हैं और अभी रहेंगी। उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं है। उनकी पारी अभी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। उन्हें पार्टी के भीतर सबका विश्वास प्राप्त है। उनकी स्वीकार्यता जनता में भी है।
उनकी सेहत को लेकर कही जा रही बातें महज अफवाह हैं, सोनिया जी पूरी तरह पार्टी की अगुआ पंक्ति में हैं। राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं और अध्यक्ष के नेतृत्व में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए अपना पूरा योगदान दे रहे हैं।
सवाल: लगातार कांग्रेस की हार के लिए पार्टी का नेतृत्व जिम्मेदार नहीं है तो कौन जिम्मेदार है?
जवाब: दरअसल कांग्रेस मीडिया, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सूचना तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर सकी, जबकि भाजपा और खासकर मोदी ने उसका जमकर इस्तेमाल किया।
यूपीए की दोनों सरकारों में जितना काम हुआ उतना पिछले 65 सालों में नहीं हुआ। पहले कुछ सीमित क्षेत्रों में सरकार का फोकस होता था, लेकिन सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान तकनीक सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व काम किया।
लेकिन कांग्रेस पार्टी सकारात्मक रूप से उसे जनता तक नहीं पहुंचा सकी जबकि भाजपा प्रचार में हीरो और काम में जीरो है, वहीं कांग्रेस काम में हीरो लेकिन प्रचार में जीरो है।
सवाल: क्या कांग्रेस की छवि मुस्लिम परस्त बन जाना भी हार की वजह है, जैसा कि खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के.एंटनी भी कह चुके हैं?
जवाब: कांग्रेस हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध, अगड़े पिछड़े सबकी पार्टी है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठनों ने जो दुष्प्रचार किया, पार्टी उसका सही जवाब नहीं दे सकी।
कांग्रेस सबको जोडऩे वाली पार्टी है जबकि भाजपा तोडऩे वाली। जोडऩा मुश्किल होता है, तोडऩा आसान होता है। आग लगाना आसान है लेकिन आग बुझाना मुश्किल है।
सवाल: पार्टी में प्रियंका गांधी को लाने की मांग भी उठ रही है। आपकी क्या राय है?
जवाब: रायबरेली और अमेठी में प्रियंका लगातार सक्रिय हैं। सोनिया जी और राहुल जी के चुनाव में वह अपना पूरा योगदान देती हैं। इन दोनों की लगातार जीत में उनका भी योगदान है। आगे का फैसला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को करना है।