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मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है पार्टी में बगावत

Sun, 09 Mar 2014 07:53 AM IST
Updated Sun, 09 Mar 2014 07:53 AM IST
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Bjp internal politics biggest problem for modi

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के रथ पर सवार भाजपा-एनडीए केंद्र की सत्ता सियासत का ताज हासिल करने के लिए उम्मीदों की उड़ान भर रहा है।

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कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ मुद्दों की भरमार ने उनकी इस उड़ान को पंख भी लगाए हैं, मगर चुनावी मैदान और सियासी समीकरणों के कई ऐसे स्पीड ब्रेकर हैं जो एनडीए की इस उड़ान की कमजोर कड़ी हैं।

इनमें सबसे कमजोर कड़ी जहां देश भर में भाजपा की मौजूदगी न होना है। वहीं दूसरी कमजोर कड़ी गठबंधन के मामले में पार्टी की स्वीकार्यता कांग्रेस के मुकाबले कम होना है।

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मोदी के ल‌िए बड़ी चुनौती

Bjp internal politics biggest problem for modi

इन चुनौतियों के बीच भाजपा के शीर्ष नेताओं में जिस तरह टिकट बंटवारे और चुनाव लड़ने के बहाने अंदरूनी घमासान एक बार फिर सामने आ रहा है वह भी मोदी के लिए बड़ी चुनौती है।

राजनीतिक ताकत के रूप में भाजपा की उपस्थिति मुख्य रूप से उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत तक ही सीमित है। दक्षिण के राज्यों कर्नाटक में दमदार उपस्थिति दर्ज करा कर पार्टी वहां एकाएक कमजोर पड़ गई है।

तो अन्य दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी अब तक सांकेतिक लड़ाई ही लड़ती आई है।

सेक्यूलर छ‌‌व‌ि का संकट

Bjp internal politics biggest problem for modi

फिर सेक्युलर छवि के संकट के कारण कई ऐसे क्षेत्रीय क्षत्रप खुल कर भाजपा या राजग के साथ खड़े नहीं हो रहे, जिनकी चुनाव के बाद सत्ता का ताज सजाने में अहम भूमिका रहने वाली है।

इसके अलावा भाजपा को अपने मिशन 272 का लक्ष्य हासिल करने के लिए राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में हर हाल में बड़ी ताकत बनने के लिए चुनौतियों से पार पाना होगा।

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में छह साल की गठबंधन सरकार चलाने की कामयाबी का रिपोर्ट कार्ड होने के बावजूद मोदी की अगुवाई वाले एनडीए के लिए राजनीतिक साथियों को जोड़ना ज्यादा बड़ी चुनौती है।

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अटल ब‌िहारी की कमी

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वाजपेयी की कामयाबी से पहले गठबंधन को लेकर दूसरे दलों के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बनाना आसान नहीं रहा है और 1996 के लोकसभा चुनाव इसका ज्वलंत प्रमाण है।

1996 के आम चुनाव में 161 सीटें जीतकर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में जरूर उभरी थी, मगर पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदार चेहरे की अगुवाई के बावजूद नए साथी न मिलने के कारण महज 13 दिन ही सरकार चला पाई थी।

उधर कांग्रेस 2004 में महज 144 सीटें जीतने के बाद भी सरकार बनाने में सफल हो गई थी।

निहितार्थ यह है कि आम चुनाव में सिर पर जीत का सेहरा बांधने के लिए भाजपा को अपने दम पर जितनी सीटें हासिल करना जरूरी है, उससे कहीं कम सीटें हासिल कर कांग्रेस सेक्युलर राजनीति के सवाल पर दूसरे दलों को ज्यादा आसानी से ला सकती है।

आडवाणी भी निर्विवाद उग्र चेहरा

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वर्ष 1980 में भाजपा के जन्म होने के साथ ही पार्टी उदारवादी और कट्टरपंथी चेहरे के समन्वय के साथ आगे बढ़ी थी। वाजपेयी पार्टी के निर्विवाद उदार चेहरा थे तो आडवाणी भी निर्विवाद उग्र चेहरा।

यह प्रयोग अंतत: वर्ष 1998 में तब सफल हुआ जब वाजपेयी को आगे कर भाजपा डेढ़ दर्जन नए सहयोगियों का साथ हासिल कर केंद्र की सत्ता में काबिज हुई। वाजेपयी इसलिए सत्ता में आए क्योंकि उनके साथ आडवाणी थे।

हिंदुत्व और विकास का चुनावी कॉकटेल

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आडवाणी वर्ष 2009 में इसलिए सत्ता पाने से वंचित रह गए, क्योंकि वह अपने लिए वाजपेयी नहीं ढूंढ पाए। 2014 में भाजपा आडवाणी के उग्र चेहरे का मोदी के रूप में बेहतर विकल्प तो ले आई है, मगर इस चुनाव में मोदी के पास भी आडवाणी की तरह ही कोई वाजपेयी नहीं है।

यह सही है कि मोदी के सहारे भाजपा ने हिंदुत्व और विकास का चुनावी कॉकटेल तैयार कर लिया है। मगर बड़ा सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या चुनाव बाद का समीकरण बदलने वाले दल इस कॉकटेल को स्वीकार करेंगे?

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