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अटल-आडवाणी की छाया से बाहर निकली भाजपा
संजय मिश्र/नई दिल्ली
Updated Sat, 14 Sep 2013 07:58 AM IST
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गुजरात दंगों के मामले में नरेंद्र मोदी को बचाने के लिए कभी लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी से किनारा किया था। आज उन्हीं मोदी के सवाल पर पूरी पार्टी ने आडवाणी से किनारा कर लिया।
तब के आडवाणी आज वाजपेयी की भूमिका में हैं। तो तब के आडवाणी की भूमिका संघ के निर्देश से पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह निभा रहे हैं।
मोदी की ताजपोशी के साथ ही जनसंघ की कोख से निकली भाजपा अटल-आडवाणी की छाया से पूरी तरह बाहर निकल आई है।
इसके साथ ही पार्टी में दशकों से जारी नरम और गरम चेहरे को साथ रखने की रणनीति का भी अंत हो गया है। आडवाणी भाजपा में अपने लिए कोई दूसरा वाजपेयी नहीं ढूंढ़ पाए तो पार्टी ने मोदी के रूप में हिंदुत्व का पर्याय माने जाने वाले आडवाणी का बेहतर विकल्प तलाश लिया है।
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इसलिए राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर मोदी के इस उदय के साथ ही भाजपा की सियासत की राह भी बदलनी तय मानी जा रही है।
जाहिर तौर पर हिंदुत्व और विकास के गुजरात मॉडल के सहारे मोदी भाजपा की चुनावी गाड़ी को सत्ता के सिंहासन तक खींचने के लिए कुछ नए प्रयोग करेंगे तो सियासत के कुछ विस्मयकारी दांव भी चलेंगे।
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आडवाणी समेत भाजपा के दर्जन भर दिग्गज केंद्रीय नेताओं को गांधीनगर में ही रहकर जिस तरह मोदी ने पटखनी दी है वह उनके मारक सियासी दांव का ही नमूना है।
आडवाणी, विपक्ष के दोनों नेताओं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के साथ पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के रहते मोदी का सियासी राजतिलक यह दर्शाता है कि नई भाजपा ने अपने आप को अब पूरी तरह से मोदी और उनके करिश्मे के हवाले कर दिया है।
मोदी उस भाजपा के खेवनहार बने हैं जिनके नेतृत्व में बने राजग में सहयोगी दलों की संख्या 21 से घट कर तीन रह गई है। मोदी के पास न तो राम मंदिर जैसा राष्ट्रव्यापी मुद्दा है और न ही आडवाणी जैसा संगठनकर्ता और न ही वाजपेयी जैसा उदार चेहरा।
फिर पार्टी लोकसभा की 542 सीटों में अपने सहयोगियों के साथ 15 राज्यों की 334 सीटों पर चुनाव लड़ती है। इनमें भी महज 270 से 300 के बीच ही ऐसी सीटें हैं जिस पर भाजपा गंभीरता से चुनाव लड़ती है।
पूर्वोत्तर में असम में पार्टी का थोड़ा बहुत आधार है। मगर दक्षिण में कर्नाटक में पार्टी ने अपनी ताकत खो दी है। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के साथ पूर्वोत्तर राज्यों की 185 सीटों पर इसकी उपस्थिति प्रतीकात्मक ही है।
बेशक नरेंद्र मोदी इन चुनौतियों से वाकिफ हैं और इससे भी ज्यादा चुनौती उनके विरोधी गुजरात दंगों को लेकर पेश करेंगे। आडवाणी के ऐलान में डाले गए विघ्न ने विरोधियों को इसके लिए एक और हथियार तो दे ही दिया है।