नीलगाय से मुश्किल में पड़ी वसुंधरा सरकार
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राजस्थान सरकार नए किस्म के संकट में पड़ गई है। संकट का कारण बनी है नीलगाय। एक ऐसा जानवर, जिससे देश के हर हिस्से का किसान परेशान रहता है। नीलगायों का झुंड खेतों में खड़ी फसलों को बर्बाद करने के लिए कुख्यात रहा है। उत्तर भारत में भी नीलगाय खड़ी फसलों को चर जाया करती हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है। राजस्थान सरकार के सामने भी यही मुश्किल आ गई है।
दरअसल वर्ष की शुरुआत में रणथंभौर के किसानों ने प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे से शिकायत की थी कि नीलगायों के झुंड ने भारी मात्रा में उनकी फसलों को बर्बाद किया है। राजे ने उस समय किसानों से वादा किया था कि वह समस्या का हल ढूंढ़ेंगी।
उन्होंने कहा था कि ऐसे मामलों में नीलगायों को मारने का स्पष्ट आदेश है। हालांकि कई महीने बीतने के बाद भी राज्य सरकार समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाई है। और मुद्दा उसके लिए सिरदर्द बन गया है।
नीलगाय को मारने की इजाजत कैसे दी जा सकती है?
दरअसल राज्य सरकार के सामने मुश्किल यह है कि नीलगाय के नाम में 'गाय' लगा है, तो इसे मारने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? हालांकि नीलगाय हिरन की एक प्रजाति है। अपनी मुश्किल से उबरने के लिए राज्य सरकार ने ये सवाल केंद्र सरकार को भेज दिया है। पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रकाश जावड़ेकर को समस्या का हल ढूंढ़ना है।
सूत्रों का कहना है कि प्रकाश जावड़ेकर वसुंधरा राजे की समस्या हल करने के लिए तैयार भी थे। उन्होंने इस संबंध में एक आदेश पारित करने का मन भी बना लिया लेकिन उनके सलाहकारों ने उन्हें ये कहकर मुश्किल में डाल दिया कि गोवंश की एक प्रजाति का मारने की इजाजत देने के राजनीतिक नुकसान हो सकते हैं। जावड़ेकर ने उसके बाद अपना इरादा बदल लिया।
राजस्थान के वनमंत्री राजकुमार रिनवा ने कहा कि नीलगाय एक जानवर है और इसके नाम में गाय भी लगा है। वैसे भी वह जानवर है और किसी जानवर को मारना ठीक नहीं है। उसे किसी ऐसे हिस्से में भी भेजा जा सकता है, जहां फसले न हो।
मामले का हल निकालने का प्रयास किया जा रहा है
वन संरक्षण अधिनियम के अनुच्छेद 11 के मुताबिक, राज्य सरकार का चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन नील गाय को मारने का आदेश दे सकता है। राजस्थान में 1990 में कांग्रेस सरकार ने एक आदेश भी पारित किया था, जिनमें उन जानवरों को मारने की इजाजत दी गई थी जो फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हों।
राजस्थान के वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ओपी मीणा ने बताया कि नियमों के बाद भी राज्य में किसी ने एक भी नीलगाय को नहीं मारा। लोगों का मानना है कि ये काम वन विभाग का है। उन्होंने कहा कि आम तौर पर राज्य में लोग शाकाहारी हैं और नील गाय के साथ धार्मिक मामला भी जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि इन तथ्यों के बाद भी मामले का हल निकालने का प्रयास किया जा रहा है। वैसे मामले का हल क्या निकलता है, यह देखना दिलचस्प होगा।