क्या मोदी के लिए चुनौती बन रही भाजपा?
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प्रधानमंत्री बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया को दिए अपने पहले साक्षात्कार में नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत के मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि भारत का मुसलमान देश के लिए ही जिएगा और इसी के लिए मरेगा। नरेंद्र मोदी के बयान के बाद एक बार फिर उन बयानों का एक-एक लव्ज ताजा हो गया, जो पिछले तीन महीनों में आरएसएस मुखिया मोहन भागवत, विहिप अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया, भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ और भाजपा के कई छुटभैये किस्म के सहयोगी संगठनों ने दिए।
मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू राष्ट्र, लव जिहाद और गरबा की आड़ में ऐसे बयान दिए गए, जिन्होंने केंद्र सरकार के प्रति अविश्वास का माहौल बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टी और सहयोगी संगठनों के बयानों पर चुप रहना ही मुनासिब समझा।
मोदी के सहयोगियों के बयानों का क्या किया जाए?
उन्होंने अपने पार्टी और सहयोगी संगठनों के सदस्यों की 'भावनाओं' को नजरअंदाज किया, लेकिन अपनी उदार छवि गढ़ने की लगातार कोशिश की।
15 अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से उन्होंने कहा कि हमें अगले 10 वर्षों के लिए सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और माओवाद जैसे मुद्दों पर विराम लगा देना चाहिए और विकास की बात करनी चाहिए।
मोदी के उस बयान की भी तारीफ हुई थी और कल के बयान की भी हो रही है। लेकिन सवाल ये है कि उन बयानों का क्या किया जाए, जो मोदी के ही सहयोगी दे रहे हैं।
क्या ये माना जाए कि मोदी को तो मन बदल गया है लेकिन उनके सहयोगी वहीं खड़े हैं, जहां वह पहले थे? ऐसे में क्या ये सवाल पूछना वाजिब नहीं है कि मोदी के लिए भाजपा ही चुनौती तो नहीं बन गई है?
मोदी ने तो भाजपा के कोर एजेंडे को भी दरकिनार कर दिया
लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 30 फीसदी से अधिक वोट पाया था। 30 सालों बाद किसी पाटी ने स्पष्ट बहुमत पाया था। ये तथ्य ऐसे थे जो किसी भी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता को उत्साह से भर देते। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीत का स्वागत किया जाता।
इसके बाद भी अल्पसंख्यकों के मन में भाजपा की अनुदार छवि के कारण उस जीत के बाद के भविष्य को संशय से देखा गया। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले तीन महीनों में अपनी कार्यप्रणाली से लगातार उस संशय को दूर करने की कोशिश की।
उन्होंने भाजपा के कोर एजेंडे -राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान अचार संहिता- जैसे मुद्दों को दरकिनार कर विकास और निवेश की बात की। पड़ोसी मुल्कों समेत अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ बेहतर संबंध बनाने का प्रयास किया है।
वाजपेयी की याद दिलाने लगे हैं मोदी
हालांकि भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों की दिशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों के बिलकुल विपरीत रही है। सरकार और सत्ताधारी पार्टी के विरोधभासी रवैये ने अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल की याद दिला दी है।
विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा एक बार फिर उसे ढर्रे पर लौट आई, जैसी वह राजग की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में हो गई थी। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यशैली से सरकार और स्वयं की उदार छवि बनाने की कोशिश की थी लेकिन वह अपनी पार्टी पर नियंत्रण नहीं रख पाए थे।
उस अनियंत्रण की चरम परिणति 2002 के गुजरात दंगों में दिखी थी। गुजरात दंगों में राज्य तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका से नाराज अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को यह कहकर अपने उद्गार तो जाहिर कर दिए थे कि उन्हें अपना राजधर्म निभाना चाहिए। लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करने में खुद को असहाय पाया था।
लव जिहाद पर आज तक चुप हैं मोदी
यह संयोग कि नरेंद्र मोदी आज उसी स्थान पर हैं, जहां उस समय अटल बिहारी वाजपेयी थे। मोदी के लिए चुनौती बन रही भाजपा को हाल ही में सपंन्न उपचुनावों के जरिए भी देखा जा सकता है।
भाजपा ने लोकसभा चुनावों में विकास को मुद्दा बनाया था, जबकि हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव में पार्टी ने लव जिहाद को मुद्दा बना दिया। भाजपा ने कैंपेन के लिए योगी आदित्यनाथ जैसे नेता को उतारा, जो अपने भड़काऊ बयानों के लिए पहचाने जाते रहे हैं।
भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई के नेता लव जिहाद पर बढ़ चढ़कर बयान देते रहे। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। केंद्रीय गृहमंत्री से जब इस लव जिहाद की बाबत सवाल पूछा गया तो उल्टे उन्होंने ही सवाल पूछा दिया कि लव जिहाद होता क्या है?
जिसके बाद भाजपा के सहयोगी संगठनों के कई नेताओं ने ही राजनाथ पर तीखा हमला बोल दिया था। उपचुनाव के जो नतीजे आए, वो ना मोदी के लिए मुफीद थे, ना उनकी सरकार के लिए।
हिंदुत्व के एजेंडे का क्या करेंगे मोदी?
मोदी ने लव जिहाद जैसे मुद्दे पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी। वह मोहन भागवत के उस बयान पर भी चुप रहे, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। विश्लेषकों का मानना है कि हिंदुत्ववादी पार्टी के रूप में भाजपा ने पिछले तीन महीनों में अपने का और मजबूत किया है।
भाजपा कार्यकर्ता जमीन पर लगातार हिंदुत्व के एजेंडे को केंद्र में रखकर काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी अपने बयानों और कार्यशैली के जरिए अपनी उदार छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
आने वाले वर्षों में प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के बीच का ये विरोध और तल्ख हो सकता है। प्रधामंत्री अपनी गढ़ती हुई छवि के अनुरूप ही रहे और भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर ही आगे बढ़ती रही तो एक ऐसा बिंदु भी है आएगा जब भाजपा ही प्रधानमंत्री के लिए चुनौती बन जाएगी।