अधिक सीटें पाने का दबाव बनाने में जुटे सहयोगी
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बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजग के सहयोगी दल भाजपा पर दबाव बनाने में जुट गए हैं। अधिक से अधिक सीटें हासिल करने की रणनीति बनाने में जुटे सहयोगी दल जल्द से जल्द सीटों का बंटवारा करना चाहते हैं, जबकि भाजपा एक रणनीति के तहत इस पर फैसला करने में थोड़ा वक्त लगाना चाहती है।
पार्टी के राण्नीतिकार चाहते हैं कि राजग से पहले जदयू-राजद-कांग्रेस और वामदलों के गठबंधन के बीच सीटों का बंटवारा हो जाए, जिससे सहयोगी दल अधिक सीटें हासिल करने के लिए उस पर ज्यादा दबाव न डाल सके। भाजपा की इस रणनीति से वाकिफ राजग के सहयोगी दल इस मामले में देरी होने पर कम सीटें मिलने की संभावना से बेचैन हैं।
यही कारण है कि जहां भाजपा की सहयोगी रालोसपा ने 67 सीटों पर दावेदारी के साथ ही उपेंद्र कुशवाहा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, वहीं लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के उम्मीदवारों पर निशाना साध रहे हैं।
भाजपा की मुश्किल
भाजपा की मुश्किल यह है कि उसके सहयोगी दल उसकी उम्मीदों से बहुत ज्यादा सीटें चाहते हैं, जबकि पार्टी ने हम को अधिकतम 8, रालोसपा को 18 और लोजपा को 36 सीटें देने का फार्मूला तैयार किया है। पार्टी के रणनीतिकारों को लगता है कि अभी से इस फार्मूले पर बात शुरू करने पर विवाद खड़ा हो सकता है।
बिहार चुनाव में सीटों के बंटवारे पर राजग में विवाद तय है। पार्टी के सहयोगी जदयू-राजद मिलन को भाजपा पर दबाव बढ़ाने का एक बड़ा अवसर मान रहे हैं। खासतौर से इस संबंध में रालोसपा के रुख से भाजपा खेमे में चिंता है।
रालोसपा प्रमुख ने जहां सीएम पद पर दावेदारी पेश कर दी है, वहीं राजग में विवाद पैदा करने के लिए राजद सुप्रीमो ने न केवल कुशवाहा का समर्थन किया है, बल्कि यह भी कहा है कि अगर वह राजग छोड़ कर जनता परिवार के साथ आते हैं तो उनके इस दावे पर विचार किया जाएगा।
सीटों के समझौते के इंतजार में है पार्टी
भाजपा की दूसरी वजह तीनों सहयोगियों की ओर से मांगी गई सीटों की संख्या है। रालोसपा ने 67, लोजपा ने 80 तो मांझी ने 50 सीटों पर दावा किया है। जबकि पार्टी ने प्रति लोकसभा 6 सीटें देने का ही मन बनाया है।
मांझी ने भाजपा में विलय के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है तो पार्टी को राजद से निष्कासित सांसद पप्पू यादव के लिए भी परोक्ष गठबंधन के तौर पर कुछ सीटें छोड़नी होंगी।
पार्टी के रणनीतिकारों को लगता है कि विरोधी दलों के बीच सीटों के बंटवारे का विवाद हल हो जाने के बाद उसके सहयोगी उस पर दबाव नहीं बना पाएंगे। यही कारण है कि सहयोगियों की लगातार मांग के बावजूद भाजपा राजग की बैठक नहीं बुला रही है।