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दलित मुख्यमंत्री फिर भी दलित उत्पीड़न?

Mon, 10 Nov 2014 04:47 PM IST
Updated Mon, 10 Nov 2014 04:47 PM IST
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bihar dalit caste

पिछले दो महीने में बिहार में दलित उत्पीड़न के तीन बड़े मामले सामने आए हैं। ये मामले एक दलित युवक की हत्या, धमकी के बाद दलितों के सामूहिक पलायन और दलित महिलाओं के साथ हुए कथित बलात्कार से संबंधित हैं।

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वहीं बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा है कि दलित होने के कारण उन्हें भी भेदभाव का सामना करना पड़ा था।

क्या बिहार में पिछले कुछ सालों में दलित उत्पीड़न के मामलों में तेज़ी आई है?

क्या राज्य में दलित तबके का मुख्यमंत्री होते हुए भी दलितों का शोषण हो रहा है?

क्या है ज़मीनी हक़ीक़त पढ़िए इस रिपोर्ट में

जनवरी 2013 से इस साल अगस्त तक दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 10,681 मामले दर्ज हुए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें 91 हत्या के मामले भी शामिल हैं।

जानकार इसके लिए कई बातों को जिम्मेवार मानते हैं, जिनमें राज्य में हुए और हो रहे सामाजिक-राजनीतिक बदलाव सबसे प्रमुख हैं।

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य और इतिहासकार डॉक्टर ओपी जायसवाल कहते हैं, "2005 में भारतीय जनता पार्टी के राज्य की सत्ता में भागीदार बनने के बाद से समाज के शोषक वर्ग का मनोबल बढ़ा है। इस वजह से दलित उत्पीड़न की संख्या बढ़ी है।"

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बिहार में पिछले दो महीने में हुई तीन बड़ी घटनाएँ

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25 सितंबर को राज्य के गया ज़िले के टेकारी प्रखंड के पूरा गांव के लगभग सौ दलित परिवार लगातार मिल रही कथित धमकी के कारण पलायन कर गए थे। हालांकि प्रशासन की तरफ़ से आश्वासन मिलने पर तीन दिनों बाद सभी परिवार गांव वापस आ गए।
आठ अक्तूबर को भोजपुर ज़िले के सिकरहट्टा थाने के कुरमुरी गांव में छह महादलित महिलाओं के साथ कथित सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया था। पीड़ितों में तीन नाबालिग भी थीं।

15 अक्तूबर को बिहार के रोहतास ज़िले में 15 साल के एक दलित युवक साईं राम को कथित रुप से जलाने का मामला सामने आया था। इस घटना में युवक की मौत हो गई थी।

जायसवाल मानते हैं कि 2013 में जनता दल(यू)-भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गठबंधन टूटने के बावजूद इस साल केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद इन ताकतों को और मजबूती मिली है।

सरकारी आंकड़े भी ओपी जयसवाल के नज़रिए की पुष्टि करते हैं। साल 2002 से 2005 के बीच जहां दलित उत्पीड़न के 5538 मामले दर्ज हुए थे तो साल 2006 से 2009 के बीच इनकी संख्या बढ़कर 9052 हो गई।
‘प्रतिरोध की प्रतिक्रिया में उत्पीड़न’

वहीं बिहार अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विद्यानंद विकल इसकी दूसरी वजह मानते हैं।

उनके अनुसार 2006 के पहले भी दलित उत्पीड़न की घटनाएं बड़ी संख्या में होती थीं लेकिन पुलिस के रवैए और दूसरे कारणों से वे दर्ज नहीं हो पाती थीं।

विकल के अनुसार 2005 और ख़ासकर 2010 के बाद से राज्य सरकार की पहल पर जब से राज्य के सभी जिलों में अलग से एससी-एसटी थाने काम करने लगे हैं। ऐसे मामले अब कहीं बड़ी संख्या में दर्ज हो रहे हैं।

पटना स्थित अनुग्रह नारायण सिंह समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक और समाजशास्त्री डॉक्टर डीएम दिवाकर के अनुसार दलित उत्पीड़न कोई नई बात नहीं बल्कि ऐतिहासिक सच है।

दिवाकर के अनुसार समाज की सामंती संरचना अभी नहीं बदली है। ऐसे में जब दलित प्रतिरोध कर रहे हैं, उत्पीड़न को नियति मानने को तैयार नहीं है तो परिणाम उनके और उत्पीड़न के रूप में सामने आ रहा है।

दलित-पिछड़ा एकता में टूट

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दिवाकर कहते हैं, "आज एक दलित बिहार के मुख्यमंत्री हैं। वे दलितों से संगठित होने और जागरूक होने का आह्वान कर रहे हैं। ऐसे में नेतृत्व के आश्वासन और इससे पैदा हुए उत्साह के कारण भी दलितों का प्रतिरोध बढ़ा है।"

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता महेंद्र सुमन राज्य के सामाजिक ताने-बाने में आए बदलाव को भी बढ़ते उत्पीड़न का एक कारण मानते हैं।

महेंद्र कहते हैं, "मंडलवादी राजनीति के उभार के दौर में दलित और पिछड़ी जातियों के बीच व्यापक एकता कायम हुई थी। बाद के सालों में यह एकता खंडित हुई। दलितों के साथ पिछड़ा नेतृत्व मजबूती से खड़ा नहीं हुआ और नतीजतन उनका उत्पीड़न बढ़ा है।"

‘दलित मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ साजिश’


विद्यानंद विकल पिछले एक साल के थोड़े अधिक समय में दलित उत्पीड़न की घटनाओं में तेज़ वृद्धि की दो अन्य वजहें भी बताते हैं।

पिछले साल बथानी-टोला और लक्ष्मणपुर बाथे जैसे बड़े नरसंहारों के कथित दोषियों को पटना उच्च न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया था।

विकल के अनुसार इन फ़ैसलों का काफी मनोवैज्ञानिक असर पड़ा है और इससे सामंती ताकतों का मनोबल बढ़ा है।

विकल मानते हैं कि हाल में हुई बड़ी घटनाएं एक दलित मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ राजनीतिक साजिश हैं।

विकल कहते हैं, "सामंती ताकतों की रणनीति एक दलित मुख्यमंत्री के शासनकाल में मार-काट मचाने की है। जिससे कि भविष्य में किसी दलित की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी यह कहकर ख़ारिज कर दी जाए कि एक दलित सरकार का नेतृत्व नहीं कर सकता।"

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प्रतिक्रिया और अपेक्षा

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इन घटनाओं के प्रति दलित समाज की क्या प्रतिक्रिया है?

इस संबंध में दलित अधिकार मंच के अध्यक्ष कपिलेश्वर राम कहते हैं, "ऐसी घटनाओं के बाद दलितों के बीच थोड़े समय के लिए डर पैदा होता है, दलित समाज सशंकित होता है। लेकिन दलित साथ ही अब इससे उबरते हुए कानून का सहारा लेकर अपनी लड़ाई लड़ने को उठ खड़े हो रहे हैं।"

कपिलेश्वर भोजपुर में हुए कथित सामूहिक बलात्कार का उदाहरण देते हैं, जहां घटना के एक दिन बाद पीड़ितों ने साहस करके मामला दर्ज कराया।

कपिलेश्वर कहते हैं कि आज दलितों की सरकार से यह अपेक्षा है कि प्रशासन न केवल उनकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करे बल्कि उत्पीड़न के मामलों में तुरंत हस्तक्षेप भी करे।

कपिलेश्वर के अनुसार राहत की बात यह है कि हाल की घटनाओं के बाद सरकार और प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाने के साथ-साथ त्वरित कार्रवाई भी की है।

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