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तब तो मौत की आहट से भी नींद नहीं टूटी

Wed, 03 Dec 2014 07:35 PM IST
Updated Wed, 03 Dec 2014 07:35 PM IST
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bhopal gas tragedy before 30 years.

यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित संयंत्र में बन रही जानलेवा गैस से शहर कभी भी मौत के मुँह में जा सकता था, और जब यह ख़बर पहली बार प्रकाशित हुई तो किसी ने इसपर ध्यान नहीं दिया।

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यह भी उजागर हुआ कि कंपनी के कर्मचारियों और राज्य के नेताओं-अफ़सरों के बीच शायद भीतरी सांठगांठ थी। घटना से क़रीब दो महीने पहले हुए एक मामूली रिसाव की घटना को कुछ विधायकों ने विधानसभा में उठाया लेकिन उसके बाद भी सरकार नहीं जागी।
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अगर सरकार ने समय रहते क़दम उठाया होता शायद हज़ारों जानें बच जातीं और भोपाल इस भयानक त्रासदी का गवाह बनने से बच गया होता।

पढ़ें लेख विस्तार से
भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से उत्पन्न हो सकने वाले ख़तरे पर मेरी पहली रपट को लेकर मिली बेहद ठंडी प्रतिक्रिया ने मुझे सदमे में डाल दिया। मैं निराश तो हुआ लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अपनी बातों पर मेरा यकीन सरकार और अवाम की उदासीनता से कहीं ज्यादा पक्का था। मेरी पड़तालों ने जब दहशत की एक दुनिया को ही मेरे सामने पेश कर दिया, तो मेरे इरादे और मज़बूत हो गए। खोजबीन के दौरान यूनियन कार्बाइड और शासकों के बीच के रिश्ते को लेकर एक के बाद हैरतअंगेज रहस्य मेरे सामने खुलते चले गए।
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सितंबर, 1982 से जून 1984 के बीच कंपनी से लाभ पाने वाले नेताओं और अफ़सरों की पूरी सूची मैंने छाप दी। इतना बताना काफी होगा कि कंपनी ने तब के नेताओं और नौकरशाहों के रिश्तेदारों को ऊंचे वेतन पर नौकरी दे रखी थी। भोपाल की ऊपरी झील के आगे बना कंपनी का खूबसूरत गेस्ट हाउस आला नेताओं की पसंदीदा ऐशगाह थी।

तारीफ़ में कसीदे

bhopal gas tragedy before 30 years.

मैंने यूनियन कार्बाइड के बारे में जानकारियां हासिल करने के लिए राज्य के कृषि विभाग, औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संपर्क किए और जिस भी अफ़सर से मिला, वह कंपनी और उसकी असाधारण सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ में कसीदे पढ़ता ही मिला। जब मैं कारखाने में हुई चूकों का जिक्र करता तो वे दूसरी कंपनियों की उनसे भी ज्यादा बड़ी गलतियां गिनाने लगते।

जब भी मैं शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों से यूनियन कार्बाइड के बारे में बात करने की कोशिश करता, तब-तब वे इस तरह पेश आते मानों किसी ने उनके कपड़ों में बिच्छू छोड़ दिया हो। मेरे लिए यह जानना बेहद ज़रूरी था क्योंकि यूनियन कार्बाइड में रसायनों के कारण बीमार पड़ने वाले कामगार इलाज के लिए यहीं आया करते थे।

कंपनी ने अपने खर्चे से यहां एक विशेष निजी वार्ड भी बना रखा था ताकि सब कुछ परदे में रहे। जाहिर है, यहां के कुछ सीनियर डॉक्टर कंपनी के ‘खैरख्वाह’ थे। लेकिन कई जूनियर डॉक्टर भी थे, जो आख़िर में मददगार साबित हुए।

सरकारी दफ़्तरों का हाल

bhopal gas tragedy before 30 years.

सरकारी दफ्तरों का भी यही हाल था। निचले स्तर का कोई-न-कोई असंतुष्ट अफ़सर या क्लर्क यूनियन कार्बाइड की अनसुनी कहानियों से जुड़े दस्तावेजों को हासिल करने में मेरी मदद कर देता था।

बशीर और मालवीय के नेतृत्व वाले यूनियन की गतिविधियों में मेरी शिरकतें मेरे नेक इरादों के बारे में कामगारों में भरोसा जगाती थीं। उस दौर में कारखाने में मेरे दोस्तों की तादाद काफी बढ़ गई थी।

यूनियन की गतिविधियों की खबरों को स्थानीय अखबारों में जगह दिलाने के लिए मैंने अपने पत्रकार मित्रों की मदद से जो कोशिशें की उन्होंने भी कुछ काम किया। इसने मेरी स्थिति को और मजबूत किया।

अब कारखाने की हर चीज मेरी पहुंच में थी। इतनी कामयाबी पाने के बाद मैं अगली रपट के साथ तैयार था। एक अक्तूबर 1982 के अंक में यह रपट ज्यादा साफ और कुछ सनसनीखेज शीर्षक ‘ज्वालामुखी के मुहाने बैठा भोपाल’ के साथ छपी।

ख़बर का उपशीर्षक था- ‘एक से डेढ़ घंटे में भोपाल इंसानी लाशों का ढेर’। इस रपट पर भी वैसी ही ठंडी प्रतिक्रिया मिली।

निराशा की हद

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पाँच अक्तूबर को जब यूनियन कार्बाइड कारखाने से एमआईसी, क्लोरोफॉर्म और हाइड्रोक्लोरिक एसिड के मिश्रण का कुछ हिस्सा रिसा, तो मेरा गुस्सा और मेरी निराशा अपनी आखिरी हद तक पहुंच गई।

रिसाव को कुछ मिनटों में काबू पा लिया गया लेकिन उसका असर आस-पास के इलाके में देर तक बना रहा और इसने आसपास की झुग्गियों में रहने वालों के देर रात अपने-अपने घर से भागने को मजबूर कर दिया। कारखाने के 18 कामगार भी घायल हो गए।

मेरे अखबार के पहले पन्ने पर मेरी तीसरी रपट आठ अक्तूबर को छपी। इसका शीर्षक ‘न समझोगे तो आखिर मिट ही जाओगे’ इक़बाल की इन मशहूर पंक्तियों की तर्ज पर बनाया गया था, ‘न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तान वाले, तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में’।

जाहिर है, यह शीर्षक पाठकों को जगाने के लिए दिया गया था। फिर भी, लगा कि किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

पत्रकार से बना एक्टिविस्ट

bhopal gas tragedy before 30 years.

लेकिन मैंने तय कर लिया था कि डटा रहूंगा। मैंने सोचा, अब मुझे पत्रकार की भूमिका छोड़ कर एक एक्टिविस्ट का बाना धारण करना होगा। मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को पत्र लिखकर अपील की कि वे लोगों की जान बचाएं। इसका भी कोई असर न हुआ। अपने अखबार की प्रतियां लेकर मैं विधायकों के पास गया और उन्हें बताया कि हालात किस कदर विस्फोटक हो गए हैं। यह कोशिश काम कर गई लेकिन बहुत सीमित रूप में।

1982 में कुछ हमदर्द विधायकों ने मसले को विधानसभा में उठाया लेकिन यह कहकर उनकी आवाज दबा दी गई कि आपदा को लेकर तमाम आशंकाएं बेबुनियाद हैं। तत्कालीन श्रम मंत्री तारा सिंह वियोगी ने सदन को यूनियन कार्बाइड कारखाने में सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था का भरोसा दिलाया। लोग की जान के खतरे को दूर करने के लिए कारखाने को नगरपालिका की सीमा से बाहर स्थानांतरित करने की मांग उन्होंने खारिज कर दी।

उनका कहना था कि "यह कोई पत्थर का टुकड़ा नहीं है कि जिसे यों ही एक जगह से ले जाकर दूसरी जगह रख दिया जाए।"

न्यायपालिका से उम्मीदें

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राजनीतिक तंत्र से निराश होकर मैंने अपनी उम्मीदें न्यायपालिका पर टिकाईं। 15 दिसंबर 1982 को मैंने सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजकर याचिका दायर की कि वह इस मामले में दखल दे। वहां से मुझे डाक से बस एक पावती पत्र मिला, और कुछ नहीं।

मेरी नाकाम मुहिम अब तक मीडिया में और दोस्तों के बीच मखौल का विषय बन गई थी। मेरे दोस्त मुझे सनकी समझने लगे थे। ठगा और हारा हुआ महसूस करके मैंने अपने अखबार को बंद कर दिया।

इसके बाद 1983 में भोपाल को मैंने अलविदा कहा और हिंदी अखबार ‘नव भारत’में काम करने के लिए इंदौर चला गया। यहां मैं एक साल रहा लेकिन भोपाल की ख़ामोश सदाओं ने कभी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। और वाकई मैं भोपाल लौट आया।

आंतरिक रिपोर्टें

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मैंने खबर पर नए सिरे से काम करना शुरू किया। इस बार कार्बाइड की एक सुरक्षा ऑडिट की कुछ आंतरिक रिपोर्टें मेरे हाथ लग गईं। यह अमरीका से आई एक तीन सदस्यीय टीम ने भोपाल प्लांट की जांच के बाद कंपनी के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अधिकारियों के लिए तैयार की गई एक गुप्त रिपोर्ट थी।

इस रिपोर्ट में प्लांट की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए थे, अपनी बात को और पुख़्तगी देने के लिए मैंने इस ऑडिट रिपोर्ट के कुछ अंश अपनी नई रिपोर्ट में शामिल कर लिए।

एक बात जो मुझे लगातार महसूस हो रही थी कि मेरी बात को गंभीरता से न लेने के पीछे एक कारण शायद यह भी था कि इस तरह की किसी घटना दुनिया में कहीं और नहीं हुई थी, लिहाज़ा बिना किसी मिसाल के लोगों को इस बात पर राज़ी करना मुश्किल था कि ऐसा हो सकता है।

ऐसी ही मिसाल की तलाश में मेरे हाथ दैनिक 'आज' में प्रकाशित एक ख़बर लग गई, ख़बर थी लखनऊ के ऐशबाग़ इलाके में क्लोरीन गैस के रिसाव की। इस ख़बर के मुताबिक इस घटना ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे जिनके बारे में पहले से कहता आ रहा था कि ये भोपाल में कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर पैदा हो सकते हैं। क्लोरीन से हालांकि मौतें नही हुई थीं लेकिन सैकड़ों लोग घायल हो गए थी और उन्हें घर छोड़कर भागना पड़ा था।

अस्वीकार फिर स्वीकार
मेरे लेख को हिंदी की लोकप्रिय पत्रिका ‘रविवार’ने अस्वीकार करके लौटा दिया, तो मैंने दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार ‘जनसत्ता’ में किस्मत आजमाने का फैसला किया। ढेरों दस्तावेजों के साथ अपनी रपट लेकर मैं इस अखबार के संपादक प्रभाष जोशी से मिलने और उन्हें कायल करने के लिए दिल्ली पहुंच गया।

उन्होंने दस्तावेजों को देखा, मेरी बातें सुनी, मेरी रपट पढ़ी और बिना समय गंवाए उसे छापने को तैयार हो गए। 16 जून 1984 के ‘जनसत्ता’ में करीब आधे पेज पर मेरी रपट ‘ज्वालामुखी के मुहाने बैठा भोपाल' शीर्षक के साथ छपी।

इसके बाद भी सरकारी अमले की नींद नहीं टूटी। वह छह महीने बाद तभी हरकत में आया जब भोपाल हादसे की चपेट में आ गया। वह हरकत भी बस अपने गुनाहों पर लीपापोती के लिए थी।

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