{"_id":"4265c19c-3cb1-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"bhopal-gas-tragedy-28-years-on-mp-stuck-with-toxic-waste","type":"story","status":"publish","title_hn":"भोपाल गैस कांड: 28 साल बाद भी नष्ट नहीं किया कचरा","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
भोपाल गैस कांड: 28 साल बाद भी नष्ट नहीं किया कचरा
भोपाल/इंटरनेट डेस्क
Updated Mon, 03 Dec 2012 12:21 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी माने जाने वाले यूनियन कार्बाइड गैस कांड को 28 साल बीत गए हैं, लेकिन कार्बाइड परिसर में पडे़ कचरे को आज तक नष्ट नहीं किया जा सका है और निकट भविष्य में इसके निपटान की कोई उम्मीद भी नजर नहीं आ रही है।
विज्ञापन
राज्य सरकार द्वारा सबसे पहले यूनियन कार्बाइड परिसर में पडे़ लगभग 350 मी टन कचरे का निपटान गुजरात के अंकलेश्वर में करने का निर्णय लिया गया था और उस समय गुजरात सरकार भी इसके लिए तैयार हो गई थी, लेकिन गुजरात की जनता द्वारा इसको लेकर आंदोलन किए जाने के बाद गुजरात सरकार ने कचरा वहां लाए जाने से इनकार कर दिया।
विज्ञापन
गुजरात सरकार द्वारा कचरा नष्ट करने से इनकार करने के बाद सरकार ने मध्य प्रदेश के धार जिले के पीथमपुर में कचरा नष्ट करने का निर्णय लिया और 40 मी. टन कचरा वहां जला भी दिया गया था, लेकिन यह मामला प्रकाश में आने के बाद यहां विरोध में किए गए आंदोलन के बाद स्वयं मप्र सरकार ने इससे अपने हाथ खींच लिए।
विज्ञापन
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नागपुर में डीआरडीओ स्थित इंसीनिरेटर में कचरे को नष्ट करने के आदेश दिया, लेकिन महाराष्ट्र के प्रदूषण निवारण मंडल ने इसकी अनुमति नहीं दी और महाराष्ट्र सरकार ने भी नागपुर में कचरा जलाने से इनकार कर दिया।
प्रदेश सरकार ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण ली और न्यायालय ने नागपुर स्थित इंसीनिरेटर के निरीक्षण के आदेश दिए, लेकिन न्यायालय को यह बताया गया कि वहां स्थित इंसीनिरेटर इतनी बड़ी मात्र में जहरीला कचरा नष्ट करने में सक्षम नहीं है।
सरकार द्वारा महाराष्ट्र के कजोला में भी कचरा नष्ट करने पर विचार किया गया, लेकिन प्रदूषण निवारण मंडल द्वारा अनुमति नहीं दिये जाने से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। उल्लेखनीय है कि दो तीन दिसंबर 1984 की रात हुई इस त्रासदी में हजारों लोगों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि लाखों लोग प्रभावित हैं।
भोपाल की वो काली रात
-भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है।
-तीन दिसंबर, 1984 की आधी रात को यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली थीं।
-यूनियन कार्बाइड में हुए रिसाव के बाद वातावरण में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस घुल गई।
-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गए थे।
- गैरसरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या 15000 से ज्यादा थी।
कैसे हुआ हादसा
-यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था।
-इसकी वजह थी टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का पानी से मिल जाना।
-इससे हुई रासायनिक प्रक्रिया की वजह से टैंक में दबाव पैदा हो गया और टैंक खुल गया और गैस रिसने लगी
-लोगों को मौत की नींद सुलाने में विषैली गैस को औसतन तीन मिनट लगे।
हादसा जो दे गया कई सबक
-एक बड़े शहर के बीच में खतरनाक रसायनिक फैक्ट्री को लगाना।
-आपदा प्रबंधन योजना का अभाव।
-हादसे के बाद तात्कालिक और दीर्घकालीन कार्रवाई का अभाव।
-फैक्ट्रियों के प्रदूषण की निगरानी एवं नियंत्रण में स्थानीय लोगों के लिए कोई स्थान न होना।
-जवाबदेही तय करने के लिए कठोर कानूनों एवं विश्वसनीय तंत्र का अभाव।
-उद्योगों की जवाबदेही तय करने के बारे में कोई ठोस बाध्यकारी नीति का न होना।
-आपदा प्रबंधन योजनाओं में स्थानीय लोगों को शामिल न किया जाना।
पर्यावरण पर असर
-यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के कारण आस-पास काभूजल मानक स्तर से 561 गुना ज्यादा प्रदूषित हो गया।
-कारखाने में और उसके चारों तरफ तकरीबन 10 हजार मीट्रिक टन से अधिक कचरा जमीन में दबा हुआ है।
-बीते कई सालों से बरसात के पानी के साथ घुलकर अब तक 14 बस्तियों की 40 हजार आबादी के भूजल को जहरीला बना चुका है।
-सीएसई के शोध में परिसर से तीन किलोमीटर दूर और 30 मीटर गहराई तक जहरीले रसायन पाए गए।
क्या बनता था इस कारखाने में
यूनियन कार्बाइड कारखाने में कारबारील, एल्डिकार्ब और सेबिडॉल जैसे खतरनाक कीटनाशकों का उत्पादन होता था। संयंत्र में पारे और क्त्रसेमियम जैसी दीर्घस्थायी और जहरीली धातुएं भी इस्तेमाल होती थीं।
सरकार का कृषि विभाग उन कीटनाशकों का एक बड़ा खरीददार था। भोपाल कारखाने से कीटनाशकों का निर्यात दूसरे देशों को किया जाता था और उससे भारत को निर्यात शुल्क की आय होती थी।
जानकारों का कहना है कि कीटनाशकों की आड़ में यह कारखाना कुछ ऐसे प्रतिबंधित घातक एवं खतरनाक उत्पाद भी तैयार करता था, जिन्हें बनाने की अनुमति अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में नहीं है।
अभी भी है राहत की तलाश
भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों में से 11,587 को मुआवजे का भुगतान किया जाना शेष है। लोकसभा में 26 अप्रैल 2012 को सांख्यिकी राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीकांत कुमार जेना ने कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद के प्रश्न के लिखित में बताया कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुरूप 31 मार्च 2012 तक कुल 5,62,789 मामलों में मुआवजे के तौर पर 1510.53 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया गया है। शेष 11,587 मामलों में यथानुपात मुआवजे का भुगतान किया जाना शेष है।
यूनियन कार्बाइड और विवाद
हॉक्स नेस्ट सुरंग आपदा सन 1927 और 1932 के बीच पश्चिम वर्जीनिया सुरंग परियोजना में घटी थी, जिसे यूनियन कार्बाइड के नेतृत्व में बनाया जा रहा था। सुरंग के निर्माण के दौरान श्रमिकों को सिलिका खनिज मिला और उन्हें उसका खनन करने का आदेश मिला।
इस सिलिका का प्रयोग इस्पात के वैद्युतप्रसंस्करण में होना था। खनिकों को खनन के दौरान सुरक्षा उपकरण जैसे कि नकाब (मास्क) या श्वसन यंत्र नहीं प्रदान किए गये। सिलिका की धूल के संपर्क में आने से कई खनिकों को एक कमजोर फेफड़ों की बीमारी सिलिकोसिस हो गयी। निर्माण स्थल के एक ऐतिहासिक स्मारकपट्ट के अनुसार, सिलिकोसिस 109 मौतों के लिए जिम्मेदार थी। एक कॉंग्रेशनल सुनवाई के अनुसार मरने वालों की संख्या 476 थी।