अंबेडकर को हथियाने की फिराक में क्यों हैं बीजेपी और कांग्रेस?
पिछली सदी का आखिरी दशक प्रतीकों को गढ़ने की राजनीति का था और मौजूदा सदी का मौजूदा दशक प्रतीकों को 'हथियाने' का। महात्मा गांधी, सरदर वल्लभ भाई पटेल और भगत सिंह के बाद डॉ भीम राव अंबेडकर 'हथियाने' की राजनीति के निशाने पर है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक के उभार के बाद से ही बसपा अंबेडकर पर अपना दावा करती रही है। जानकारों का मानना है कि उत्तर भारत में अंबेडकर की मूर्तियों के जरिए राजनीतिक सशक्तिकरण की जैसी मुहिम बसपा ने एक दौर में चलाई, संभवतः अन्य किसी दल ने नहीं चलाई।
अंबेडकर की उसी विरासत पर भाजपा और कांग्रेस ने एक साथ धावा बोला है। बसपा अंबेडकर को अपनी खेमें में रखने के लिए जद्दोजहद कर रही है, भाजपा और कांग्रेस उसे अपने खेमें में करने पर।
अंबेडकर की छीनाझपटी का सबसे बड़ा दंगल 14 अप्रैल को
अंबेडकर की छीनाझपटी का सबसे बड़ा दंगल 14 अप्रैल को दिखाई दे सकता है। 14 अप्रैल को अंबेडकर का 125वां जन्मदिवस है। बसपा पिछले कई सालों से 14 अप्रैल को शानदार तरीके से मनाती रही है।
भाजपा और कांग्रेस ने भी इस बार अंबेडकर का जन्म दिवस जोर-शोर से मनाने की तैयारी में है।
कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू की 125वी जयंती पर जिस प्रकार वर्ष भर कार्यक्रम किए थे, उसी प्रकार अंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल से शुरू होकर पूरे वर्ष तक कार्यक्रम किए जाएंगे। अंबेडकर की भी इस बार 125वीं जयंती है। भाजपा ने अंबेडकर की याद में दिल्ली में मेमोरियल बनाने का फैसला किया है। मेमोरियल के लिए जमीन भी तय कर ली गई है।
यहां ये बताना अहम होगा कि पिछले वर्ष दिल्ली में चौधरी चरण सिंह का मेमोरियल बनाने के लिए राष्ट्रीय लोक दल ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया था। लेकिन मोदी सरकार ने उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया और कहा कि कानूनी पेचीदीगियों के कारण दिल्ली में मेमोरियल निर्माण की इजाजत देना संभव नहीं है।
बीजेपी और कांग्रेस से भी तेज दौड़ रहा है आरएसएस
अंबेडकर की विरासत का वारिस बनने के लिए आरएसएस बीजेपी और कांग्रेस से भी ज्यादा तेज गति से दौड़ रहा है। आरएसएस ने आगामी 14 अप्रैल को अंबेडकर बिलकुल ही नए वैचारिक और रजनीतिक अवतार में पेश करने की योजना बना रखी है।
14 अप्रैल को आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य और आर्गेनाइजर का बंपर अंक प्रकाशित होना है।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आरएसएस की योजना अंबेडकर को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की है, जो इस्लामिक आक्रमण, इस्लाम में धर्मांतरण, कम्यूनिज्म और अनुच्छेद 370 के घोर खिलाफ है। आशय यह है कि आरएसएस अंबेडकर को अपनी कोर राजनीति के आइकॉन के रूप में पेश कर सकती है।
उसी रिपोर्ट के मुताबिक, आरएसएस अंबेडकर को घर वापसी के समर्थक के रूप में भी स्थापित कर सकती है। उल्लेखनीय है कि इसाई और मुस्लिमों को हिंदू धर्म में शामिल करने के अभियान को आरएसएस ने घर वापसी का नाम दिया है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर नजर
जानकारों का मानना है कि राजनीतिक दलों में अंबेडकर को हथियाने के लिए हो
रही धिंगामुस्ती दरअसल बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के
मद्देनजर है। बिहारी में इसी साल के अंत में और उत्तर प्रदेश में 2017 में
विधानसभा चुनाव होने हैं।
दोनों ही राज्यों में दलितों की मजबूत
हिस्सेदारी है। उत्तर प्रदेश में दलित कई विधानसभा सीटों पर निर्णायत
स्थिति में हैं। 2007 में बसपा ने दलितों और ब्राह्मणों के गठजोड़ से
विधानसभा में बहुमत हासिल किया था।
बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा
गठबंधन ने यूपी में 73 सीटें जीतें थीं। दलितों ने उसे बड़ी संख्या में वोट
दिया था। बिहार में भी पार्टी ने 22 सीटें जीती थी। लोकसभा चुनावों की
जीत की गति विधानसभा तक बरकरार रखने के लिए अंबेडकर अहम जरिया हो सकते
हैं। कांग्रेस को बिहार और यूपी में अंबेडर संजीवनी दे सकते हैं। अंबेडकर
की हथियाने के लिए हो रही कवायद का मकसद शायद यही हो।