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सिर्फ फांसी नहीं थी, जानिए भगत सिंह की मौत का सच!

Sun, 28 Sep 2014 11:45 AM IST
Updated Sun, 28 Sep 2014 11:45 AM IST
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यह 24 मार्च 1931 की सुबह थी। और लोगों में एक अजीब सी बेचैनी थी। एक खबर लोग आसपास से सुन रहे थे और उसका सच जानने के लिए यहां-वहां भागे जा रहे थे। और अखबार तलाश रहे थे।
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यह खबर थी सरदार भगत सिंह और उनके दो साथी सुखदेव और राजुगुरु की फांसी की। उस सुबह जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पढ़ी कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम 7:33 पर फांसी दे दी गई। वह सोमवार का दिन था।
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ऐसा कहा जाता है कि उस शाम जेल में पंद्रह मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे।

केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकने के जिस मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन उस समय के पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी था उससे सरकार डरी हुई थी। और उसी का नतीजा रहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तरीके से तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।
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फांसी के समय जो कुछ आधिकारिक लोग शामिल थे उनमें यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे। जितेंदर सान्याल की लिखी किताब 'भगत सिंह' के अनुसार ठीक फांसी पर चढ़ने के पहले के वक्त भगत सिंह ने उनसे कहा, 'मिस्टर मजिस्ट्रेट आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के कांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं।'

ये भगत सिंह के आखिरी वाक्य थे। लेकिन भगत सिंह, सुखदेव राजगुरू की मौत के बारे में सिर्फ इतना जानना कि उन्हें फांसी हुई थी, या तय तारीख से एक दिन पहले हुई थी काफी नहीं होगा। आगे पढ़िए कि 23 मार्च की उस शाम हुआ क्या था।

फांसी के दिन क्या हुआ

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जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे उन्होंने कई किताबें पढ़ीं। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई।

फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी ही पढ़ रहे थे।

जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"

फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला।।

फांसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहां मिट्टी का तेल डालकर इनको जलाया जाने लगा।

गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गांव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।

मृत्यु पर विवाद

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हालांकि अभी तक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी विवादित है। इस बारे में हर जगह एक सी जानकारियां नहीं मिलतीं। लेकिन कई किताबों और फिल्मों में यह जानकारी साफ तरह से है कि 23 तारीख को आखिर क्या हुआ था।

2002 में राजकुमार संतोषी की डायरेक्ट की गई फिल्म 'द लीजेंड ऑफ सिंह' में भी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी के बारे में यह हिस्सा दिखाया गया है।

फिल्म में यह दिखाया गया है कि भगत सिंह के परिवार और बाकी लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल जाती है कि तीनों क्रांतिकारियों को सजा की तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दी जा रही है।

फिल्म के दृष्य के अनुसार परिवार और बाकी लोग जेल के बाहर प्रदर्शन कर रहे होते हैं और अंदर उन्हें फांसी दे दी जाती है। जब लोग जेल के अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो उन तीनों की लाश को दूसरे गेट से बोरे में भरकर बाहर निकाला जाता है।

लेकिन प्रदर्शनकारी उन तक पहुंच जाते हैं। फिल्म में इस दृश्य के अंत में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह ब्रिटिश पुलिस उन तीनों की लाश के टुकड़े कर उन्हें जला देती है।

क्यों हुई थी सजा

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अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी।

शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है, उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए। गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल,1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए।

इस बमकांड का उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं था। इसलिए बम भी असेम्बली में ख़ाली स्थान पर ही फेंका गया था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के बाद वहाँ से भागे नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दे दी। इस समय इन्होंने वहाँ पर्चे भी बाटें, जिसका प्रथम वाक्य था कि- बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है। कुछ सुराग मिलने के बाद 'लाहौर षड़यन्त्र' केस के नाम से मुकदमा चला।

7 अक्टूबर, 1930 को फैसला सुनाया गया, जिसके अनुसार राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी की सज़ा दी गई। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावाज की सजा सुनाई गई थी।
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