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एक दंगा जिसने बदल दी बिहार की सियासत

Sun, 26 Oct 2014 12:05 PM IST
मनीष शांडिल्य/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम, भागलपुर
मनीष शांडिल्य/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम, भागलपुर Updated Sun, 26 Oct 2014 12:05 PM IST
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bhagalpur riots what changed the politics of bihar

पच्चीस साल हो गए हैं जब 1989 में अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में बिहार के भागलपुर शहर और इसके आस-पास दंगे शुरू हुए थे।

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जानकार मानते हैं कि इसने बिहार के साथ-साथ भारत की राजनीति पर भी गहरा असर छोड़ा।

भागलपुर दंगों ने राजनीति और समाज पर क्या असर डाला, पढिए भागलपुर दंगों पर बीबीसी हिंदी की विशेष श्रृंखला की आखिरी कड़ी में।

भागलपुर का दंगा 1947 के बाद बिहार के इतिहास में सबसे बडा दंगा था। इस दंगे ने पुराने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को झकझोर दिया।

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद दंगे को 'सांप्रदायिक भूकंप' की संज्ञा देते हैं। उनके अनुसार इस घटना के कारण ही तब देश से लेकर प्रदेश तक कई नए राजनीतिक समीकरण उभरे और फैसले लिए गए।

वह कहते हैं, "अगर यह दंगा नहीं होता तो शायद लालू प्रसाद यादव बिहार में यादव-मुस्लिम समीकरण नहीं बनाते। शायद तत्कालीन प्रधानमंत्री मंडल आयोग की सिफारिशें लागू नहीं करते।"

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दंगे का राजनीतिक असर

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वहीं सामाजिक कार्यकर्ता उदय भागलपुर दंगे को एक प्रयोग के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार इस प्रयोग के परिणाम अब सामने आ रहे हैं।

उदय कहते हैं, "पिछले दिनों केंद्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी की जीत ने यह साबित कर दिया है कि अल्पसंख्यकों के समर्थन के बिना भी सत्ता हासिल की जा सकती है। ऐसी राजनीति की नींव भागलपुर दंगे के दौरान रखी गई थी और आज उसे विस्तार मिला है।"

अस्सी के दशक के अंत में जब ये दंगे भडके थे तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी। राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन मानते हैं कि कांग्रेस ने इन दंगों की बडी राजनीतिक कीमत चुकाई है।

1989 के भागलपुर दंगे के बाद भारत की बडी राजनीतिक घटनाओं में भाजपा द्वारा राम मंदिर अंदोलन चलाना और बाबरी मस्जिद का ध्वंस शामिल है।

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सुमन कहते हैं, "कांग्रेस ने इन घटनाओं के प्रति जैसा राजनीतिक रुख अपनाया, उसने भागलुपर दंगे की पृष्ठभूमि में बिहार में मुसलमानों को बड़े पैमाने पर कांग्रेस से दूर कर दिया।"

उनके मुताबिक उस समय जिन राजनीतिक दलों ने धर्मनिरपेक्षता को अपना प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाया उन्हें मुसलमानों का व्यापक समर्थन मिला। तब लालू प्रसाद यादव ऐसी राजनीतिक और सामाजिक पहल करने में सबसे आगे रहे थे।

दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि इस दंगे से राज्य और समाज ने कुछ सीखा भी और आज यह सीख उपलब्धि जैसी लगती है।

इस संबंध में भागलपुर के सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर फारुख अली का कहना है, "भारत के कुछ दूसरे हिस्सों की तरह सांप्रदायिक ताकतों की पैठ बिहारी समाज में अब भी नहीं बन पाई है। ऐसा इस कारण मुमकिन हुआ क्योंकि बिहारी समाज ने भागलपुर दंगों से सीख हासिल की है।

भागलपुर दंगों के बाद बिहार में कोई बडा दंगा नहीं हुआ है। महेंद्र सुमन इसे बिहार जैसे राज्य के लिए बडी उपलब्धि मानते हैं जहां मुसलमानों की बडी आबादी रहती है।

साथ ही उनका कहना है कि भागलपुर दंगों के बाद के दौर में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से ज्यादा मौके मिले हैं। वह बताते हैं कि बिहार की राजनीति में ऐसा पहले नहीं था।

भागलपुर दंगों ने न सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक रूप से देश एवं समाज को प्रभावित किया बल्कि इस घटना ने 90 के दशक में हुए बड़े बदलावों को भी गति प्रदान की।

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