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बच्चे ही नहीं पति का भी सहारा बन गई तारा

Wed, 08 Jan 2014 01:15 PM IST
अखंड प्रताप सिंह/ अमर उजाला, गाजीपुर
अखंड प्रताप सिंह/ अमर उजाला, गाजीपुर Updated Wed, 08 Jan 2014 01:15 PM IST
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beti hi bachayegi, tara

गहमर के बासुका गांव की तारा की जिंदगी ब्याह के बाद हर दिन इम्तिहान की तरह गुजरी, लेकिन उसने मुसीबतों से हारना नहीं सीखा था तभी तो कर लिए जिंदगी के तमाम झंझावतों से दो-दो हाथ।

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अब न सिर्फ उसने पूरे परिवार को सहेज लिया है बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी मिसाल बन गई है। तारा को किसी से मदद न मिलने का भी कोई मलाल नहीं है। उसका कहना है वह अंतिम सांस तक परिवार के लिए खड़ी रहेगी।
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गाजीपुर जिले के गहमर निवासी मधुकर राय पट्टी निवासी दीना गुप्ता से तारा का ब्याह हुआ था जो शादी-विवाद एवं अन्य आयोजनों में खाना बनाने का काम करता था। 1980 में ब्याह कर आई तारा को जल्द ही पता चल गया कि उसका पति पूरी कमाई शराब में उड़ा देता है।
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बस फिर क्या था शुरू हो गए उसके दुर्दिन। कई बार समझाने का प्रयास किया लेकिन दीना पर कोई असर नहीं हुआ। कलह के बीच दिन बीतते गए। कुनबा बढ़ता गया पर पति का रवैया नहीं बदला।

तब तक पांच बेटियों और एक बेटे की मां बन चुकी तारा के परिवार में भुखमरी की नौबत आ गई। ऐसे में उसकी सास ने लोगों के घरों में चौका-बर्तन का काम शुरू कर दिया, जिससे उसके घर का चूल्हा चलता था।

धीरे-धीरे उसकी दो बेटियों ने भी अपनी दादी के साथ काम करना शुरू कर दिया। हालात अभी सुधरते, इससे पहले वक्त ने तारा को एक और झटका दिया। शराबी पति ने तारा और बच्चों को घर से निकाल दिया। बुरा वक्त आया तो रिश्तेदारों ने भी आंखें फेर लीं।

सयानी लड़कियां लेकर सड़क पर आ गई तारा का परिवार एक बार फिर भुखमरी के कगार पर आ गया। तब उसने ठान लिया कि बस वह अब और नहीं सहेगी। उसने अपनी लड़कियों के सहयोग से 1998 में गहमर बस स्टैंड पर चाय की एक छोटी सी दुकान खोल ली।

उसके सहारे रोजी-रोटी चलने लगी, लेकिन दुर्भाग्य ने उसका पीछा यहां भी नहीं छोड़ा। उसे घर से निकालने वाला पति दुकान पर आकर मारपीट कर पैसे मांगने लगा। पैसे न देने पर वह दुकान का सामान फेंक देता।

इसी बीच एक दिन नशे में धुत उसका पति ट्रेन की चपेट में आ गया। उसकी जान तो बच गई, लेकिन वह अपने हाथ-पैर गंवा बैठा। अब तारा पर परिवार के भरण-पोषण के अलावा लड़कियों के विवाह और अपाहिज पति के इलाज की भी जिम्मेदारी आ गई।

वह शिक्षित तो नहीं थी, लेकिन खाना बनाना जानती थी। उसने गांव के महाजनों से सामान उधार लिया। अपनी दुकान में चाय के साथ समोसा, पकौड़ी और मकुनी बनानी शुरू कर दी।


धीरे-धीरे तारा की किस्मत न सिर्फ बदलने लगी बल्कि उसके हौसले से हार मानने लगी। छोटी सी दुकान के बल पर उसने न सिर्फ बच्चों को यथासंभव पढ़ाया बल्कि चार पुत्रियों और एक पुत्र का विवाह भी कर दिया।

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