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...और अशिक्षित बेटी ने संभाला परिवार
अमर उजाला, मेरठ
Updated Tue, 07 Jan 2014 02:06 PM IST
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सुनीता के घर की माली हालत ऐसी रही कि पढ़ाई के लिए वह कभी स्कूल न जा सकी। पिता के लकवाग्रस्त होने के बाद जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया।
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ऐसे में 19 वर्ष की सुनीता ने घर की सारी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले लीं। उसने न सिर्फ घर की डगमगाती नैया को संभाला, बल्कि अपनी दो छोटी बहनों को पढ़ाई के लिए स्कूल भेजना भी शुरू किया। आज वह सिलाई कर अपना परिवार चला रही है।
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शहर की मलिन बस्ती प्रताप नगर में रहने वाली सुनीता चार बहनों में दूसरे नंबर की है। वर्ष-2010 में बड़ी बहन की शादी के कुछ दिन बाद ही सुनीता के पिता राजबीर को लकवा मार गया।
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परिवार पहले ही गरीबी झेल रहा था, ऐसे में घर के मुखिया का चारपाई पकड़ लेना उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। इस मुश्किल दौर में सुनीता ने हिम्मत से काम लिया।
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घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए खुद खड़ी हो गई। आज वह सिलाई करके अपनी दोनों छोटी बहनों को पढ़ा रही है, ताकि वह पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी पा सकें।
सुनीता की मां योगिंद्री भी अब एक निजी स्कूल में काम कर रही हैं। इससे वह घर खर्च में उसकी मदद कर रही हैं। सुनीता का सपना पिता की देखभाल कर उन्हें स्वस्थ देखना और दोनों बहनों को पढ़ाकर सफल बनाना है।
अशिक्षा आड़े आई तो ये सूझा
सुनीता बताती हैं, अशिक्षित होने से मेरे सामने सबसे बड़ी दिक्कत थी में करूं क्या? मुझे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। व्यापार के लिए मेरे पास धन नहीं था।
कुछ दिन रुककर अपना काम जमाने का समय भी मेरे पास नहीं था। तभी मेरे दिमाग में ख्याल आया कि मैं सिलाई जानती हूं। कपड़े सिलकर घर संभाल सकती हूं। मैंने यही काम शुरू कर दिया। दुकानदारों से तकिये के गिलाफ और पर्दे सिलने के लिए लाती हूं। इन्हें सिलकर दुकानदारों को देती हूं, इससे बंधी मजदूरी मिल जाती है।
तब जमा पैसों ने दिया साथ
सुनीता की मां योगिंद्री के लिए उसकी बेटी आज बेटे से कहीं आगे है। वह कहती हैं, बुरे दौर में हमारे पास सिलाई मशीन खरीदने के भी पैसे नहीं थे। तब सुनीता के जमा पैसों ने साथ दिया और सिलाई मशीन खरीदी।
बेटों से कम नहीं मेरी बेटी
पिता राजबीर के लिए बेटी सुनीता बेटे से कहीं आगे है। वह कहते हैं, मुझे लकवा मारा, तब सबसे बड़ी चिंता अपने परिवार की थी। ऐसे वक्त में मेरी बेटी ने पूरा घर संभाला।
शायद बेटा इतना नहीं करता, जितना बेटी कर रही है। हमारे घर के लिए यह वरदान बनकर आई है। इसने दिन-रात एक करके घर संभाल लिया।