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भाई-बहनों की माई-बाप बनी संगीता

Mon, 06 Jan 2014 11:52 AM IST
अमर उजाला, गाजीपुर
अमर उजाला, गाजीपुर Updated Mon, 06 Jan 2014 11:52 AM IST
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beti hi bachayegi, sangeeta

मुसीबतें इंसान को परेशान जरूर करती हैं लेकिन इरादे बुलंद हो तो हर कठिन राह आसान हो जाती है। इसकी बानगी है बिरनो विकास खंड के रायपुर गांव की 13 वर्षीय संगीता। माता-पिता की मौत के बाद उसके कंधे पर भाई और दो बहनों की परवरिस का जिम्मा आ गया लेकिन वह तनिक भी विचलित नहीं हुई।

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खेती बारी और आजीविका का कोई साधन नहीं होने के बावजूद वह अपनी मेहनत के बूते पिछले तीन वर्षों से अपना ही नहीं बल्कि भाई और दो बहनों का भरण-पोषण कर रही है। समाज के लिए क्या यह बेटी किसी मिसाल से कम है?
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गाजीपुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर बिरनो विकासखंड में रायपुर गांव है। गांव के निवासी श्यामलाल राजभर मजदूरी कर पत्नी बेचनी देवी, पुत्री संगीता, निशा और पुत्र भरत का लालन-पालन करते थे।
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वर्ष 2010 में उनकी कैंसर से मौत हो गई। पत्नी बेचनी गर्भवती थी। पति की मौत के कुछ माह बाद बेचनी ने मनीषा को जन्म दिया और कुछ ही दिन बाद वह भी चल बसी।

माता-पिता के बाद परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा जिसे देखकर हर कोई झकझोर उठा लेकिन श्याम लाल की बड़ी पुत्री संगीता अपने भाई भरत (8), बहन निशा (6) और दुधमुंही बहन मनीषा की परवरिस का हंसीखुशी जिम्मा उठा लिया।

आजीविका चलाने के लिए उसने मेहनत और मजदूरी को अपना हथियार बनाया। मजदूरी के जो पैसे मिलते हैं, आज उसी से वह अपना और भाई-बहनों का भरण-पोषण कर रही है।

बीमार होने पर भी भाई-बहनों के पेट की खातिर मजदूरी करना नहीं छोड़ती है। संगीता कहती है कि भाई और बहनों की परवरिस ही अब उसकी जिंदगी का मकसद है।

भाई-बहनों को दिला रही तालीम
माता-पिता की मौत होने से संगीता तालीम तो नहीं हासिल कर सकी लेकिन उसके भाई और बहनें शिक्षा की मुख्यधारा से वंचित न रहें, इसके लिए वह मजदूरी के पैसों से ही अपने भाई भरत और बहन निशा और मनीषा को तालीम हासिल करा रही है।


भाई भरत कक्षा 3, बहन निशा कक्षा 4 में पढ़ रही है जबकि सबसे छोटी बहन मनीषा भी गांव के प्राथमिक विद्यालय में जाकर क,ख,ग सीख रही है।

...जब निरस्त कर दिया गया पीला कार्ड
संगीता ने बताया कि पिता की मौत के बाद घर में मुखिया न होने का हवाला देते हुए प्रशासन ने श्यामलाल राजभर के नाम का पीला राशन कार्ड निरस्त कर दिया। लिहाजा कोटे की दुकान से सरकारी खाद्यान्न भी मिलना बंद हो गया।

इसके चलते घर में फांकाकशी की नौबत आ गई। खुद भूखी रहकर संगीता अपनी मेहनत मजदूरी के बूते कभी भी अपने भाई और बहनों को भूखे नहीं रहने दिया।

सामाजिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण दुबे की पहल पर बीते नवंबर २०१३ में जिला प्रशासन ने संगीता को राशन कार्ड मुहैया कराया।

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