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...और घर को गरीबी से बेटी ने ही उबारा

Tue, 07 Jan 2014 01:25 PM IST
अमर उजाला, ज्ञानपुर
अमर उजाला, ज्ञानपुर Updated Tue, 07 Jan 2014 01:25 PM IST
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beti hi bachayegi, manisha singh

वाराणसी के ज्ञानपुर इलाके का जोगनिका गांव निवासी वंश नारायण सिंह को हैं तो पांच संतानें, मगर तीसरे नंबर की बेटी मनीषा सिंह ने वो कर दिखाया जिसकी खुद उन्होंने कल्पना नहीं की थी।

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कालीन का कारोबार बंद होने से दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही घर की आर्थिक स्थिति को न सिर्फ मनीषा ने संभाला बल्कि भाई और बहनों की मदद करने में भी वह पीछे नहीं रही।
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मात्र 17 साल की उम्र से परिवार को सहारा दे रही मनीषा के इस जज्बे को आज पूरा गांव सलाम करता है। खुद माता-पिता भी गर्व से कहते हैं मेरे लिए तो बेटे से बढ़कर बेटी है।
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वंश नारायण सिंह का डेढ़ दशक पूर्व तक कालीन का अच्छा कारोबार था। किसी कारणवश 1998 में उनका व्यवसाय ठप पड़ गया। इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बिगडऩे लगी।

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ऐसे में वंश नारायण और अमिता सिंह की तीन बेटियों और दो बेटों में तीसरे नंबर की मनीषा सिंह ने परिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। लखनऊ से 1998 में इंटरमीडिएट करने के बाद मनीषा ने मात्र 17 साल की उम्र में गोपीगंज में चिल्ड्रेन एकेडमी और कोचिंग सेंटर खोला।

इसके बाद वह अपने परिवार का सहारा बन गई। यही नहीं, वह एनजीओ के माध्यम से भी कई तरह के काम करने लगी। मनीषा अपने छोटे भाई प्रशांत सिंह को पढ़ाने में तो सहयोग करती ही रही, बड़े भाई की जरूरतों पर भी वह हमेशा साथ खड़ी रहती।

मनीषा की दोनों बड़ी बहनों अनीषा सिंह और दीक्षिका सिंह की शादी हो चुकी है। बड़े भाई प्रशांत सिंह को चार साल पूर्व आंध्रा बैंक में मैनेजर पद पर नौकरी मिल गई, जबकि छोटे भाई को चार माह पूर्व स्वीडन में रिसर्च करने का मौका मिला।


बड़े भाई को नौकरी मिलने के बाद परिवार का आर्थिक बोझ कम होने पर मनीषा ने विद्यालय बंद कर दिया लेकिन एनजीओ के माध्यम से वह अब भी समाजसेवा कर रही है।

पिता वंशनारायण सिंह और मां अमिता सिंह आज बड़े गर्व से कहते हैं कि मेरे लिए तो बेटे से बढ़कर बेटी है। घर की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने में बेटी का ही बड़ा हाथ है।

मनीषा ने बेटे के सभी फर्ज बखूबी निभाए। मनीषा सिविल सेवा में जाना चाहती है। शादी के सवाल पर उसका कहना था कि उसके लिए परिवार की देखभाल पहले है।

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