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बेटा-बेटी का फर्क मिटने से बनेगा सभ्य समाज
अमर उजाला, झांसी
Updated Mon, 13 Jan 2014 11:30 AM IST
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देश को आजाद हुए साठ वर्ष से अधिक समय गुजरने के बाद भी हम सामाजिक कुरीतियों की सोच से मुक्त नहीं हो सके हैं। आज भी समाज के पढ़े लिखे लोग बेटा और बेटी में फर्क करते हैं, हमें इस सोच को बदलना होगा, तभी सुंदर व सभ्य समाज की स्थापना हो सकती है।
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यह संदेश अमर उजाला बेटी बचाओ अभियान के तहत तालबेहट, बबीना, बिजौली व भेल में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से रंगकर्मियों ने दिया। इस दौरान बेटी बचाने की शपथ लेने के अलावा काफी संख्या में लोगों ने बेटी के हक में शपथ पत्र भरकर बेटी बचाने का संकल्प भी लिया।
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कलाकारों ने नाटक के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हुए कहा किबेटियों को कभी गर्भ में जन्म लेने से पहले मार दिया जाता है तो कभी जन्म लेने के बाद, यह देश के लिए दुर्भाग्य का विषय है।
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आज बेटियां बेटों के बराबर कदम से कदम मिलाकर काम कर रही हैं, फिर भी उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। हमें इस सोच के साथ पुरानी कुप्रथाओं को भी बदलना होगा। बेटी ही मां, बहन और पत्नी के अलग-अलग रूपों में सभी का ध्यान रखती है तथा समाज के अस्तित्व को जिंदा रखे हुए है।
इस मौके पर कलाकारों ने बेटियों से जुड़े अनेक ज्वलंत मुद्दे उठाकर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। नुक्कड़ नाटक के कलाकारों में देवदत्त बुधौलिया, दीन बंधु, शरद नामदेव, मुवीन, आरिफ, सुनील परिहार, रमन गुपचुप आदि ने अपने अभिनय से लोगों को प्रभावित किया। कार्यक्रम में बलवंत सिंह बुंदेला, अजय प्रताप, गिरीश अगरिया, चैतन्य बिलगैयां, जग्गी झा आदि का विशेष सहयोग रहा।
बेटा व बेटी में फर्क करने वाले सबसे बड़े गुनाहगार
बेटा और बेटी में फर्क करने वाले समाज के सबसे बड़े गुनाहगार हैं। यह बात अमर उजाला द्वारा चलाए जा रहे बेटी बचाओ अभियान के तहत जनपद का पहला शपथ पत्र भरते हुए खंड विकास अधिकारी नीलम सक्सेना ने कही।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद श्रीमती सक्सेना ने कहा कि मेरी भी दो बेटियां हैं, इसके बावजूद मुझे उनसेवह स्नेह मिलता है जो एक मां को शायद बेटों से नहीं मिल सकता है। उन्होंने कहा कि लोगों को बेटा और बेटी के फर्क को मिटाना होगा। आने वाला समय बेटियों का है। उन्होंने कहा कि आज की बेटी किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं है।
बेटे से अच्छी हैं बेटियां
पांच पुत्रियों व एक पुत्र की मां मदीना बानो का कहना है कि वह अपनी पांचों बेटियों से हमेशा खुश रहती हैं। उनका पुत्र उन्हें वह सुख नहीं दे पा रहा है जो उसे बेटियों से मिल रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चलाया जाए अभियान
तीन बेटियों के पिता मोहन लाल श्रीवास का कहना है कि अमर उजाला द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान काफी सराहनीय है। इसे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रमुखता के साथ चलाया जाना चाहिए। बुंदेलखंड के क्षेत्र में अशिक्षा के कारण आज भी बेटों की खातिर बेटियों का मार दिया जाता है, इस कुप्रथा को हमें रोकना होगा।
बेटियां न होंगी तो समाज का अस्तित्व खत्म हो जाएगा
चार बेटियों व एक पुत्र के पिता जयराम अहिरवार का कहना है कि बेटा- बेटी में फर्क मानने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि वह भी किसी की बेटी से पैदा हुए हैं। यदि बेटियां न होंगी तो समाज का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
बेटियां ही बनाती हैं घर को स्वर्ग
व्यवसायी मनोज जैन की एक मात्र संतान उनकी बेटी है। मनोज कहते हैं कि इस युग में सरकार ने बेटा और बेटियों को समान अधिकार दिए हैं, फिर भी कुछ लोग आज भी बेटी और बेटा में फर्क मानते हैं जो गलत है। उनके अनुसार बेटियां ही घर को स्वर्ग बनाने का काम करती हैं।