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हिम्मत और संघर्ष का पर्याय हैं समीरुल बेगम

Sat, 18 Jan 2014 05:58 PM IST
सुरेंद्र वत्स/अमर उजाला, रुद्रपुर (देवरिया)
सुरेंद्र वत्स/अमर उजाला, रुद्रपुर (देवरिया) Updated Sat, 18 Jan 2014 05:58 PM IST
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beti hi bachayegi in devaria

मोहल्ले के लोग उन्हें बेगम बुआ के नाम से जानते हैं।

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हालांकि यह कहना भी गलत न होगा कि रुद्रपुर के मस्जिद वार्ड की समीरुल बेगम हिम्मत और जज्बे का दूसरा नाम हैं। वह हालात के अंधेरे में न सिर्फ परिवार के लिए रोशनी बनकर उभरीं बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को भी शिक्षा का उजाला दिया।

यूपी के देवरिया स्थित रुद्रपुर के वली मियां सिलाई का काम करके परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनकी सबसे छोटी बेटी समीरुल की स्कूल जाने की उम्र हुई तो न तो परिवार में ऐसा माहौल था और न माली हालत ही इसकी इजाजत देने वाली थी।
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दोनों बड़ी बहनों और इकलौते भाई अहमद का पढ़ाई से कोई वास्ता नहीं था। अहमद शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण परिवार को किसी तरह का सहारा देने में नाकाम थे।
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इन हालात में भी समीरुल के भीतर तालीम हासिल करने की ललक कम नहीं हुई। वह स्कूल जाने के साथ ही पिता के काम में भी हाथ बंटाने लगीं।

उन्होंने 1973 में हाईस्कूल और 1975 में इंटर की परीक्षा पास की। 1976 में बीटीसी करने के बाद प्राइमरी स्कूल में बतौर शिक्षक नौकरी हासिल की। नौकरी के बाद समीरुल को आर्थिक मजबूती मिली और वह वालिद की जिम्मेदारियों में भी साझीदार बन गईं।

बड़ी बहनों की शादी में पिता की मदद की। बेगम की शादी के बाद वली मियां चल बसे। वालिद के इंतकाल के बाद उनकी इस लाडली ने जिम्मेदारियों की विरासत संभाली। भाई और बहनों की औलादों की तालीम से लेकर गृहस्थी बसाने तक वह मदद करती रही हैं।

55 वर्षीय समीरुल इस समय आदर्श प्राथमिक विद्यालय रुद्रपुर में बतौर प्रधानाध्यापक कार्यरत हैं। विपरीत हालात में संघर्ष की मिसाल कायम करने वाली समीरुल आज तमाम लोगों को हौसला दे रही हैं।


दूसरों की जिंदगी संवारने की खुशी है
बैतालपुर के बलुआ निवासी हदीस समीरुल का शौहर होने पर गर्व महसूस करते हैं। वह कहते हैं कि उन्होंने हमेशा पत्नी का सहयोग किया है।

पढ़ाई-लिखाई के साथ ही मायके की मदद की भी पूरी आजादी दी। वह कहते हैं कि हमारी अपनी कोई औलाद नहीं इसका कोई मलाल नहीं हम लोग दूसरों की जिंदगी संवार कर खुश हैं।

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