...और इसी मझधार में रची गई ‘रज्जो’ की कहानी

अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 23 Jan 2014 12:41 PM IST
beti hi bachayegi, gulab gang
रज्जो (माधुरी दीक्षित) की कहानी ‘गुलाब गैंग’ का ताना-बाना मझधार में बुना गया था। ‘तुम बिन’, ‘रा-वन’ और ‘दस’ जैसी फिल्मों के निर्देशक अनुभव सिन्हा को पहली बार शौमिक सेन ने यह कहानी काशी में गंगा में नौकायन करते वक्त सुनाई थी।

अमर उजाला की मुहिम ‘बेटी ही बचाएगी’ में शिरकत करने आए अनुभव कैंटोमेंट स्थित एक होटल में बुधवार को बनारस का जिक्र छिड़ते ही बेहद भावुक हो गए।

बेहद अपनेपन से बनारस में बिताए दिनों को याद करते हुए अनुभव कहते कि बदहाल सड़कों, धूल-गर्द के बावजूद इस शहर की फिजा में कुछ तो है, जो बेचैन कर देता है। तभी तो दुनिया भर के लोगों के मन में बनारस एक कविता की तरह जिंदा है।

पूर्वांचल में हम नहीं बचा पा रहे बेटी

इसी बनारसी प्यार को महसूस करने के लिए वह रात में क्वींस कालेज के दिनों के दोस्त प्रफुल्ल चंद्र राय और राकेश शुक्ला के साथ मोटरसाइकल से शहर की गलियों में घूमने निकल पड़े। उन्होने बताया कि ढाई साल पहले की बात है। बनारस पर आधारित एक प्रेम कहानी का ताना-बाना बुनना था।

बात बन नहीं रही थी। शौमिक सेन के साथ यहां आ गया था। कुछ देर घाट पर घूमा और फिर नौकायन करने निकले। उसी वक्त शौमिक ने ‘गुलाब गैंग’ की कहानी सुनाई थी। अपने साथी मुश्ताक अहमद से मैंने चर्चा की तो उन्होंने इसे बनाने को कहा।

माधुरी दीक्षित भी बोलीं, बेटी ही बचाएगी 'कल'

फिल्म में पहली बार माधुरी दीक्षित और जूही चावला साथ काम कर रही हैं और जूही पहली बार किसी फिल्म में निगेटिव किरदार में हैं।

'बेटी ही बचाएगी' अभियान का हिस्सा बनने के लिए क्लिक करें

संगीत इस फिल्म की भी यूएसपी है और 24 जनवरी को क्रिश्चियन नर्सरी एंड प्राइमरी स्कूल (छोटी कटिंग) में फिल्म के म्यूजिक रिलीज के साथ ही गंगा की गोद से निकला ‘गुलाब गैंग’ ख्वाब लोगों के सामने साकार हो रहा है।

काशी से उनके लगाव का अंदाजा उनकी कंपनी ‘बनारस मीडिया वर्क्स’ के नाम से ही लगाया जा सकता है। वह अपने बनारस प्रेम की बाबत कहते हैं कि 1976 से 1990 तक कबीरचौरा, चउरछटवा और रविंद्रपुरी के लेन 17 में एक मकान में रहा।

कबीरचौरा की गलियों में निकलते ही सुरों से पाला पड़ता था। कलाकार तबला, कथक, गायन, सितार का रियाज करते रहते थे। वैसा संगीत फिर सुनने को नहीं मिला। अचेतन मन में बसे कबीरचौरा के स्वरों ने ही संगीत चुनने की सलाहियत दी। फिल्म भले ही कम चले लेकिन उसका संगीत हरदिल अजीज हो ही जाता है।

हर अभिभावक की तरह मेरे पिता भी मुझे इंजीनियर या डाक्टर बनाना चाहते थे। खून देखने में तकलीफ होती थी लिहाजा उनकी मर्जी के मुताबिक इंजीनियरिंग पढ़कर नौकरी करने लगा। एक साल से ज्यादा नौकरी में मन नहीं रमा। एकरस जिंदगी से वैराग्य जाग गया। सामने कुछ नहीं था फिर भी नौकरी छोड़ दी।

दिल्ली में एक डाक्यूमेंट्री बनाने के बाद मुंबई का रुख कर लिया। एक केबल चैनल के लिए ‘शिकस्त’ धारावाहिक बनाया और ‘सी हाक्स’ नाम का एक शो किया। कबीरचौरा के जिस मकान की छत पर कभी हम लोग क्रिकेट खेल लेते थे अब वह बहुत छोटी लगती है।

घाटों की हालत ठीक नहीं लगती। सड़कें बदहाल हैं। लगता है कि कोई नेता नहीं रह गया है। इसके बावजूद कुछ तो ऐसा है जो यहां खींच लाता है।

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