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हादसों से फौलादी बनते गए गीता के इरादे
मिथिलेश दुबे/ अमर उजाला, मुगलसराय
Updated Wed, 08 Jan 2014 03:13 PM IST
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हंसती-खिलखिलाती जिंदगी में जब सपनों के उड़ान भरने का वक्त आया तो मां ने साथ छोड़ दिया। अभी मां के जाने के गम से उबर नहीं पाई कि पिता और फिर बड़े भाई ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।
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ऐसे वक्त में पूरी तरह बिखर चुकी दुनिया को समेटने में गीता रानी गुप्ता ने अपना घर बसाने का इरादा बदलते हुए परिवार को ही सर्वोपरि बना दिया। वह छोटे भाई-बहन के साथ-साथ बड़े भाई की तीन बेटियों व दो बेटों के लिए सारे फर्ज निभाने वाली अभिभावक बन गई।
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नियामताबाद गांव निवासी गजाधर प्रसाद गुप्ता का चार बेटियों व दो बेटों का भरा पूरा परिवार था। दो बड़ी बेटियों की शादी करने के बाद गीता रानी गुप्ता की शादी की बात चल रही थी कि इसी समय वक्त ऐसा बदला कि गजाधर प्रसाद गुप्ता का परिवार चंद दिनों में ही छिन्न भिन्न हो गया।
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27 जनवरी 1988 को गजाधर प्रसाद की पत्नी रजनी गुप्ता की घर में ही लगी आटा चक्की के पट्टे में फंसकर मौत हो गई। दोनों बहनों के ससुराल जाने के बाद छोटी बहन व भाई के परवरिश की जिम्मेदारी गीता (40) के कंधे पर आ गई। इसी बीच बड़े भाई मंगला प्रसाद का बीमारी के बाद निधन हो गया।
इसके कुछ दिनों बाद ही गजाधर प्रसाद भी नहीं रहे। एक के बाद एक हुए कई हादसों ने गीता को न सिर्फ झकझोरा बल्कि वक्त से लडऩे की ताकत भी दी। इसके बाद डबल एमए और बीएड उपाधि धारक गीता ने आजीवन शादी न करने का फैसला लिया। उसने बड़े भाई की तीन बेटियों की परवरिश और छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारी संभाल ली।
गांव से निकली गीता रानी ने जीविका के लिए मुगलसराय में ब्यूटी पार्लर खोल लिया। इसी के सहारे गीता ने छोटी बहन व छोटे भाई की शादी की। इसके बाद बड़ी भतीजी की शादी की और दो भतीजों दो भतीजियों को अपने साथ रखकर पढ़ा लिखा रही हैं।
उनका कहना है कि जिम्मेदारियों ने कभी वक्त नहीं दिया पीछे मुड़कर देखने और सोचने के लिए। अब तो यही दुनिया है। मां-बाप के निधन के बाद बेटा बनकर उनके जिम्मेदारियों का निर्वहन करना मेरी प्राथमिकता थी।
हां पीएचडी करने का सपना था जो पूरा नहीं कर पाई। पर इसका कोई मलाल नहीं है। कहा कि संघर्ष से कभी नहीं घबड़ाना चाहिए। आज मेरे यहां पीडि़त लड़कियां-महिलाएं आती हैं, तो उन्हें यथासंभव मदद देती हूं। इसके लिए भगवान का शुक्रगुजार होती हूं। क्योंकि यही तो जीवन है।