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बीहड़ों में बेटियों को हक दिला रहीं दुइजी अम्मा

Thu, 23 Jan 2014 03:01 PM IST
सुधीर सिंह/अमर उजाला, इलाहाबाद
सुधीर सिंह/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Thu, 23 Jan 2014 03:01 PM IST
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beti hi bachayegi Duiji Amma

महिला अधिकारों के लिए समर्पित शंकरगढ़ जैसे बीहड़ इलाके के पहाड़ पर बसीं दुइजी उनके लिए मिसाल बन गई हैं। दलित समाज से जुड़ीं दुइजी बीते दो दशकों से महिलाओं के बीच अलख जगाकर उनकी आवाज को बुलंद करने में जुटी हैं।

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बेटियों, महिलाओं के अधिकारों के लिए दिल्ली, लखनऊ, बिहार, सहारनपुर, इलाहाबाद, कानपुर, नोएडा आदि स्थानों में धरना देकर उन्होंने अपनी झोली में जीत दर्ज कराई। कई हजार गांवों में महिलाओं और बेटियों के हित में अभियान चलाना और जीतना उनका मकसद रहा।
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इसके तहत उन्होंने बहू हिस्सा, महिला हिस्सा, पारिवारिक हिस्सा सहित ठेकेदारों से मुक्ति के लिए कई अभियान चलाए।

खनन ठेकेदारों से मुक्ति दिलाने का काम भी अम्मा के नेतृत्व में ही किया गया। खनन मजदूर महिलाओं को जब लीज मिली तो पुलिस की मिली भगत से ठेकेदारों ने उनका उत्पीडऩ शुरू किया लेकिन दुइजी के नेतृत्व में महिलाओं ने धरना देकर पुलिस को खदेड़ दिया।
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दुइजी अम्मा ने महिलाओं को घूंघट से निकालकर उनके लिए सीध टिकट, सोनबरसा, पहाड़ी आदि गांवों में खनन के लिए लीज दिलाई। अशिक्षित होने के बावजूद आज अम्मा गांव के बच्चों को स्कूलों में शिक्षा दिलाने में भी जुटी हैं।

यूपी, बिहार से लेकर दिल्ली तक महिलाओं के आंदोलन को बढ़ावा देने वाली अम्मा का कहना है कि बेटियों को बचाने के लिए समाज को आगे आने की जरूरत है।

मूल रूप से शंकरगढ़ के जूही कोठी की दलित बस्ती पहाड़ी की रहने वाली सत्तर बरस की दुइजी वर्ष 1981 में पति के मौत के बाद घूंघट से बाहर निकलकर महिला समाख्या की ओर से महिलाओं को एकजुट करने में जुट गईं।


शुरुआत में महिला समाख्या की टीम के गांव-गांव पहुंचने पर गांव की बहू-बेटियां घर के बाहर निकलने से कतराती रहीं लेकिन दुइजी की कोशिश ने उन्हें संगठित करते हुए महिलाओं, बटियों के हक के लिए बड़ा संगठन तैयार किया। उनके संघर्षों के लिए ही उन्हें महिला समाख्या की ओर से प्रतिष्ठित नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था।

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