फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   beti hi bachayegi, coffee with editor

पराया धन नहीं होतीं बेटियां

Tue, 07 Jan 2014 11:52 AM IST
अमर उजाला, वाराणसी
अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 07 Jan 2014 11:52 AM IST
विज्ञापन
beti hi bachayegi, coffee with editor

बेटी ही हिफाजत करेगी, समस्याओं को सुलझाएगी। यह बात अब बनारसी समाज में जेरेबहस हो गई है। 'बेटी ही बचाएगी' मुहिम के तहत शहर के विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन हस्तियों के बीच संवाद का सिलसिला 'काफी विद एडिटर' में दूसरे दिन भी जारी रहा।

विज्ञापन


उद्यमी दीनानाथ झुनझुनवाला एवं साहित्यकार अजय मिश्र ने दो टूक कहा कि बेटियां पराया धन नहीं दो परिवारों की खुशहाली होती हैं। उनके बिना समाज की कल्पना भी कैसे ही जा सकती है।
विज्ञापन


उद्योगपति एवं समाजसेवी दीनानाथ झुनझुनवाला और लेखक-पत्रकार अजय मिश्र इस बात पर सहमत नजर आए कि भगवान शंकर को भी भोजन के लिए मां अन्नपूर्णा की आवश्यकता होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दीनानाथ झुनझुनवाला
बेटियों को दोयम दर्जे का नागरिक समझने की आदत छोडऩी होगी। बेटी पराया धन नहीं हैं। बेटियां माता-पिता की जितनी परवाह करती हैं, उतना बेटे नहीं करते हैं। मेरी बेटी हांगकांग गई है। जाते-जाते वह जन्मदिन का उपहार भेजती गई।

बेटियों को पढ़ाना जरूरी है। लड़कियों की शादी के समय भी पढ़ाई के बारे में पूछा ही जाता है। परंतु पढ़ाई के साथ-साथ उनको हुनरमंद भी बनाना जरूरी है। बेटी स्वावलंबी होगी तो उसका शोषण नहीं होगा।

नई-नई मशीनें आ जाने के कारण रसोईघर में घंटे-दो घंटे का काम रह गया है। उसके बाद बहू और बेटियां खाली हो जाती हैं। उनके समय का सदुपयोग होना चाहिए। पर्दा प्रथा टूट रही है। विधवा पुनर्विवाह भी होना चाहिए।

हर पिता अपनी बेटी को अपनी सामथ्र्य भर उपहार देकर विदा करता है। शादी में मांग कर ली जाने वाली रकम दहेज होती है। विवाह के बाद भी बेटी को भूलना नहीं चाहिए लेकिन ससुराल की व्यवस्था में माता-पिता को हस्तक्षेप भी नहीं करना चाहिए।

बेटे से वंश चलेगा। बेटा ही श्राद्ध करेगा। बेटा ही परिवार की परवरिश करेगा। ऐसे विचार अब बेमानी हो गए हैं। धर्माचार्यों को प्रयास करके लोगों के मन से इन बातों को दूर करना चाहिए। समाज स्त्री-पुरुष अनुपात घटने से विसंगति पैदा हो रही है।

अजय मिश्र
मध्यवर्ग एवं उच्च वर्ग में पढ़ी लिखी महिलाएं भी प्रताडऩा सहती रहती हैं। बेटियों की परवरिश इस तरह करनी चाहिए कि उनका व्यक्तित्व आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास से लबरेज हो। ऐसी ही बेटी परिवार और देश दोनों को बचाएगी।

बेटियों को अनिवार्य और स्वावलंबी बनने तक शिक्षा मिलनी चाहिए। उनकी अभिरुचि के अनुसार व्यावसायिक शिक्षा के भी प्रेरित करना चाहिए। आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री ही अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में आजाद होगी।

बेटी को चूल्हे-चौके और घर की दहलीज में तक बांधना उचित नहीं है। घर से बाहर निकलने पर उनमें आत्मविश्वास आएगा। स्त्री-पुरुष दोनों ही बराबरी से कदम बढ़ाएंगे तभी समाज की प्रगति ठीक से होगी।

दुर्भाग्य की बात है कि दहेज प्रथा में पढ़ी-लिखी महिलाओं का भी हाथ है। हिंदू कोड बिल में बेटियों को संपत्ति में अधिकार दिया है लेकिन हालात तब सुधरेंगे जब पिता वसीयत बनाते समय बेटी-बेटे को बराबर समझे। इस हक को समझेगी तो बेटी दहेज के पक्ष में नहीं खड़ी होगी।

मनुष्य स्वभाव से भीरु होता है जबकि स्त्रियां आत्मविश्वास से लबरेज और दमखम से भरी होती हैं। समस्या का हल वही खोजती हैं। समाज को चलाने की कुंजी उन्हीं के पास है। उनकी क्षमता पर समाज का विश्वास जगाना होगा।


समाज के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की आवश्यकता है। बेटियां नहीं होंगी तो समाज भी नहीं होगा। हर किसी को 'बेटी के हक में शपथ' लेनी चाहिए क्योंकि बेटी नहीं होगी तो समाज भी नहीं होगा, बेटी ही बचाएगी सबको।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed