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खानदान का चिराग बनीं नरगिस आपा

Fri, 03 Jan 2014 04:08 PM IST
डा. राकेश राय/अमर उजाला, गोरखपुर
डा. राकेश राय/अमर उजाला, गोरखपुर Updated Fri, 03 Jan 2014 04:08 PM IST
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beti hi bachayegi, Nargis aapa

बेटे से कमतर नहीं होती बेटी, यह महज कोरी किताबी बात नहीं बल्कि हकीकत है माया बाजार में रहने वाली नरगिस की। वही नरगिस जिन्होंने पिता के न रहने पर घर के मुखिया की जिम्मेदारी निभाई।

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खुद से छोटे सात बहन-भाइयों की पिता बनकर परवरिश की और आत्मनिर्भर बनाया। छोटों को बड़ा करके अपने पैर पर खड़ा करने की इस कोशिश में नरगिस ने कभी खुद का घर बसाने के लिए सोचा ही नहीं।
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अब मोहल्ले के बच्चों को अपना कुनबा बताती हैं। तालीम और नसीहत देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। इसके चलते परिवार के सदस्य ही नहीं बल्कि पूरा मोहल्ला उन्हें नरगिस आपा कहकर बुलाता है।
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साल 1974 में जब पिता मिर्जा अली हुसैन का इंतकाल हुआ तो नरगिस 24 साल की थीं। बताती हैं कि रेलवे प्रेस में काम करने वाले पिता के न रहने से जहां खुद की जिंदगी के लिए बुने सपने टूटते दिखे, वहीं सवाल खड़ा हुआ घर चलाने का।

मां के अलावा छह छोटे भाई और एक बहन की परवरिश की जिम्मेदारी थी। साथ ही सामाजिक वर्जनाओं का दबाव। बताती हैं कि छह-सात दशक पहले बेटी की नौकरी तो दूर पढ़ाई भी आसान नहीं थी। खासकर पर्दा पसंद मुस्लिम समाज में।

बचपन में खुद की पढ़ाई के समय इस तरह की बंदिश से वह जूझी भी थीं। बताती हैं कि इमामबाड़ा स्कूल में कक्षा आठ की पढ़ाई पूरी होते ही परिवार ने आगे न पढ़ाने का फैसला सुना दिया था।

अपनी जिद से पिता को रजामंद करके पढ़ाई जारी रखी और 1968 में सेंट एंड्रयूज कॉलेज से बीए की डिग्री लेने में कामयाब रहीं। जिद से पढ़ाई आगे बढ़ाने की मंशा तो पूरी कर ली मगर इससे खफा चाचा ने कई साल उनसे बोलचाल नहीं रखी।

बकौल नरगिस, पिता के निधन के बाद घर चलाने के लिए नौकरी करना ही एक मात्र रास्ता था लेकिन खुद की पढ़ाई में आड़े आईं पाबंदियों और रिश्तेदारों के रवैये से इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं।

काफी उधेड़बुन के बाद अपने मन की करने की ठानी और कुछ कोशिश से इमामबाड़ा स्कूल में लिपिक के पद पर नौकरी पाने में कामयाब रही। इस नौकरी के सहारे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर संभाला।

एक-एक कर छोटे भाई मिर्जा जमीर बेग, शाह आलम, आफताब, अफरोज, फिरोज आलम, मुनीर को पैरों पर खड़ा किया। बहन नाहिद की शादी कराई। बहन और भाइयों के घर बसवाने की कोशिशों में ही सेवानिवृत्ति का वक्त आ गया।


उसके बाद से घर पर मोहल्ले के बच्चों की क्लास लगाकर तालीम बांट रही हैं। कहती हैं- नन्हों के बड़े कुनबे के साथ रहकर लगता नहीं अकेली हूं।

जब तक बहन-भाइयों की जिम्मेदारी थी तो खुद की शादी के लिए सोचा ही नहीं। डर था कि दूसरे घर में चले जाने से यह घर बिखर जाएगा। जब बहन-भाइयों को आत्मनिर्भर बनाने, उनका घर बसवाने की जिम्मेदारी पूरी हुई तो वक्त काफी आगे जा जा चुका था। खुद का घर बसाने लायक समय नहीं बचा था।

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