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घर-बार छोड़ बेटियों को बना रहीं सबला
अनुज मित्तल/अमर उजाला, मेरठ
Updated Fri, 03 Jan 2014 04:04 PM IST
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बेटियों को सबला बनाने के लिए एक बेटी ने 14 साल पहले अपना घर छोड़ दिया। समाज में बेटियों से दुर्व्यवहार और पक्षपात ने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। तब से आज तक वह बेटियां को आत्म निर्भर बनाने में जुटी हैं।
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उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति का ही नतीजा है कि आज जिले के दूर गांव में बगैर सरकारी अनुदान के वह कन्या गुरुकुल चला रही हैं। इसमें देशभर से 65 बच्चियां न सिर्फ किताबी ज्ञान, बल्कि संस्कार लेने के साथ मार्शल आर्ट, लाठी चलाना और निशानेबाजी सीख रही हैं। वह भी पूरी तरह से निशुल्क।
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मूल रूप से छत्तीसगढ़ की रहने वाली 40 वर्षीय रश्मि ने अपना जीवन अपने ही जैसी बेटियों का भविष्य संवारने के लिए समर्पित कर दिया है। संस्कृत और समाजशास्त्र से एमए और बीएड रश्मि ने 14 साल पहले बेटी और बेटे के बीच पक्षपात के चलते अपना घर छोड़ दिया था।
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इस दौरान रश्मि को सरकारी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी भी मिली, लेकिन उन्होंने नहीं की। अपनी मुहिम में इस कदर रमीं कि शादी भी नहीं की।
खुद को कई बार बंधाई हिम्मत
वर्ष-2005 में रश्मि ने परीक्षितगढ़ ब्लॉक के ग्राम नारंगपुर में सर्वोदय नेता भोपाल सिंह के सहयोग से उनके घेर में श्रीमद दयानंद उत्कर्ष आर्श कन्या गुरुकुल की शुरुआत की थी।
रश्मि बताती हैं कि शुरुआत में सिर्फ 5 बच्चियां थीं। भोपाल सिंह के घेर में उनकी बेटी के सहयोग से इन बच्चियों को शिक्षा देना शुरू किया। रोजाना कस्बे और आसपास के गांवों में जाकर लोगों से संपर्क कर गुरुकुल के लिए दान मांगती थीं। इस दौरान कई बार हिम्मत टूटी, लेकिन हर बार संभलते हुए वह आगे बढ़ती गईं।
कई राज्यों की बच्चियां पढ़ रहीं
समाजसेवियों के सहयोग से नारंगपुर में जमीन मिली। उस पर कन्या गुरुकुल के भवन का शिलान्यास हुआ। आज इस भवन में 14 कमरे हैं। यहां असम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम आदि की 65 बच्चियां नर्सरी से 12वीं तक की आवासीय शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।
वैदिक शिक्षा संग मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग
गुरुकुल में बच्चियों को वेद पाठ और यज्ञ के साथ मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग दी जाती है। योग, जूडो कराटे, लाठी चलाना और निशानेबाजी तक सिखाई जाती है।
पहले पढ़ीं, अब पढ़ा रही हैं
अरुणाचल की रहने वाली कल्पना आठ साल पहले गुरुकुल में पढ़ने आई थीं। अब वह बीए में पढ़ रही हैं और गुरुकुल की कन्याओं को पढ़ा भी रही हैं। इसके साथ ही नारंगपुर गांव की गुलशन सैफी और शमीम सैफी भी गुरुकुल में शिक्षा दे रही हैं।
खुद करती हैं सारे काम
रश्मि गुरुकुल के सारे काम खुद करती हैं। वह गुरुकुल के मेस की सब्जी लाने से लेकर वाहनों, जेनरेटर को ठीक कराना गांव और शहर जाकर समाजसेवियों से गुरुकुल के लिए मदद जुटाने तक का काम खुद करती हैं।