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पति के ठेले से ‘किस्मती’ ने संवारी किस्मत
अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Fri, 03 Jan 2014 12:24 PM IST
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चुनौतियां सामने हों तो जिम्मेदारी निभाने में महिलाएं कभी पीछे नहीं रहती हैं। इसे साबित कर दिखाया है सरायमीर की ‘किस्मती’ ने, जिसने पति की मौत के बाद न केवल परिवार को विपत्तियों से उबारा वरन परिवार का सम्मान भी बनाए रखा।
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सिर पर पगड़ी बांधकर सड़कों पर ठेला खींचती ‘किस्मती’ ने अपनी किस्मत तो संवारी ही अपने हौसले के बूत वह नारियों के लिए ही नहीं पुरुषों के लिए भी मिसाल बन गई है।
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सरायमीर थाना क्षेत्र के ग्राम मंजीर पट्टी की रहने वाली ‘किस्मती’ का विवाह सुभाष से हुआ था। पति सुभाष ठेला चला कर अपने पिता, पत्नी और दो बच्चों के परिवार का पेट पालता था। ठेले की कमाई से पूरा परिवार खुशी से रह रहा था। 2001 में इस परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा।
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एक सड़क हादसे में सुभाष की मौत हो गई। पति की मौत से टूट चुकी पैतीस वर्षीय ‘किस्मती’ पर अब अपने ससुर के साथ ही दो पुत्रों प्रकाश और बबलू के लालन-पालन की जिम्मेदारी आ गई। बच्चों की भूख और बूढ़े ससुर की सूखती जा रही अंतड़ियां उससे देखी नहीं गईं।
उसने चुनौती स्वीकार की और सिर पर पगड़ी बांधकर अपने पति के ठेले का हैंडिल थाम लिया। पगड़ी बांध ठेला लेकर पहले दिन जब वह गांव से सरायमीर बाजार में पहुंची तो लोगों की निगाहें उसी पर लग गई थीं। अब वह ठेले पर सामान ढोती है और अपना परिवार चलाती है।
शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए वह कहती है कि पति की राह पर चलते वक्त शुरू में परेशानी हुई, मगर लोगों ने भी साथ दिया तो मेरे जीवन को नया रास्ता मिल गया। आज ठेले की कमाई से ही दोनों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
बड़ा लड़का प्रकाश कक्षा 10 में और छोटा बेटा बबलू कक्षा सात में पढ़ रहा है। ससुर का 2005 में देहांत हो गया। ‘किस्मती’ का कहना है कि संघर्षपूर्ण जीवन में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने का जो सपना संजोया है, उसे पूरा करने में ही लगी हुई हूं।
काश! बेटियों को कमतर मानने वाले इससे कुछ सीख ले पाते।