ओबामा की भारत यात्रा मोदी का कूटनीतिक छक्का: नटवर सिंह
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तीन दिवसीय भारत यात्रा पर देश और दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह से हिमांशु मिश्र ने इस यात्रा के निहितार्थ पर विस्तार से बातचीत की-
ओबामा के दूसरी बार भारत आने को आप क्या कहेंगे?
-बेहद ऐतिहासिक साबित होगी ओबामा की यह भारत यात्रा। मैं तो कहूंगा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने महज दो महीने में ओबामा को यात्रा के लिए राजी कर कूटनीति के मैदान में जबरदस्त छक्का जड़ा है। मोदी के इस कूटनीतिक दांव से पाकिस्तान समेत भारत के पड़ोसी ही नहीं दुनिया के कई देश हतप्रभ हैं। इसी यात्रा के कारण आतंकवाद के संदर्भ में पाकिस्तान को अमेरिकी दबाव में कुछ ठोस पहल करने पड़े हैं। मसलन अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने जमात-उद-दावा और हक्कानी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाया। पाक को आतंकी जकीउर रहमान लखवी को भारत को सौंपने की सलाह दी। मेरा मानना है कि इस यात्रा के बाद भारत द्वारा दी जाने वाली जानकारियों के आधार पर अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ ज्यादा सख्त रुख अपनाएगा।
इस यात्रा में मोदी की सफलता देखने की क्या वजह है?
-कई वजह हैं। कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में दोबारा भारत नहीं आया है। ओबामा की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब हमारे पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के चार महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा कराने के लिए कम से कम 6 से 8 महीने का समय लगता है। मगर इस बार यह प्रक्रिया महज दो महीने से भी कम समय में पूरी कर ली गई। ध्यान देने वाली बात यह है कि ओबामा इस बार खासतौर पर भारत की ही यात्रा पर होंगे। उनके इस कार्यक्रम में पाकिस्तान सहित कोई अन्य देश शामिल नहीं है। आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विदेशी दौरे में ऐसा संभव नहीं होता। इस यात्रा ने साफ कर दिया है कि पहली बार रिश्ता बनाने के मामले में भारत प्रमुखता से अमेरिकी रडार पर है।
आपके हिसाब से इस यात्रा से भारत को क्या हासिल होगा?
-अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा को रूटीन यात्रा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। फिर यह भी तय है कि ओबामा इस यात्रा में खाली हाथ नहीं आ रहे। मुझे लगता है कि इस यात्रा से भारत को निवेश के क्षेत्र में व्यापक फायदा पहुंचेगा। भारत अमेरिका के माध्यम से आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान पर नकेल डालने में सफल होगा। इसके अलावा ओबामा भारत की यूएन में स्थाई सदस्यता का रास्ता साफ कर सकते हैं। इस समय देश को निवेश की बहुत जरूरत है। चीन, जापान के बाद अब अमेरिका की भी भारत के बाजार पर निगाह है। जाहिर है कि भारत इस यात्रा से दुनिया भर में अपने बाजार के पक्ष में मिले माहौल का फायदा उठा सकता है।
ओबामा भी भारत से खाली हाथ वापस जाने के लिए तो नहीं आ रहे?
-निश्चित रूप से ओबामा भी खाली हाथ नहीं जाएंगे। महत्वपूर्ण रक्षा सौदा होना तय है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए परमाणु उत्तरदायित्व कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव पर सहमति बन सकती है। अमेरिका जलवायु क्षेत्र के साथ साथ निवेश-व्यापार संबंधी क्षेत्र पर भी ध्यान केंद्रित करेगा।