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कुर्सी जाने के बाद इसे क्यों छोड़ दिया बंसल ने?

Sun, 12 May 2013 12:50 AM IST
नई दिल्ली/बृजेश सिंह
नई दिल्ली/बृजेश सिंह Updated Sun, 12 May 2013 12:50 AM IST
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bansal give up favourite train after resignation

रेल मंत्री की कुर्सी से बेआबरू होकर हटने के बाद पवन कुमार बंसल चौबीस घंटे के अंदर ही गुपचुप तरीके से दिल्ली से चंडीगढ़ रवाना हो गए। लेकिन रेल से नहीं, सड़क मार्ग से।

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बंसल शनिवार को इनोवा कार में पूरे परिवार के साथ तीन बजे रवाना हुए। इससे पहले शताब्दी ट्रेन से वे चंड़ीगढ़ की यात्रा किया करते थे। बंसल रेल मंत्री की कुर्सी पर कुल छह महीना तेरह दिन रहे।
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पिछले फेरबदल में रेल मंत्री बनने के बाद 29 अक्टूबर 2012 को उन्होंने दो राज्यमंत्रियों के साथ रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला था।

पहले ही दिन उन्होंने रेलवे की आर्थिक स्थिति सुधारने का अपना इरादा जाहिर किया था। लेकिन छह माह बीतते बीतते रेलवे प्रमोशन घूसकांड से यही आभास मिलता है कि अपने विभाग के बजाय निकटस्थों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में लगे हुए थे।
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रेल मंत्रालय के दूसरे तल के गलियारे में यद्यपि पिछले दो-तीन महीने से चंड़ीगढ़ लॉबी की हर ठेका-परमिट में दखलंदाजी की चर्चा आम थी।

लेकिन इतनी जल्दी मामला खुलेगा और मंत्रीजी को कुर्सी गंवानी पड़ेगी यह न किसी को उम्मीद थी और न बंसल ने ही सपने में ऐसा सोचा होगा।

रेल मंत्रालय में अधिकारियों की धारणा है कि बंसल को उनकी मंडली ही ले डूबी। वे अफसरों से ज्यादा अपने कुनबे पर भरोसा करते थे।

इसीलिए जब वे घूसकांड में घिरे तो रेलवे का एक भी अफसर उनके बचाव में नहीं दिखाई दिया। शुक्रवार की रात पद छोड़ने के बाद रेलवे का कोई अधिकारी उनके आस-पास नजर नहीं आया।


बंसल ने रेलमंत्री बनने के बाद चंड़ीगढ़ के लिए नई शताब्दी ट्रेन चलवाई थी। वे अक्सर इसी ट्रेन से चंड़ीगढ़ आते जाते थे। अब कुर्सी गई तो उन्होंने इस ट्रेन में चलना भी गवारा नहीं किया।

जाहिर है वहां बंसल को रिसीव करने के लिए रेलवे का कोई अधिकारी मौजूद नहीं होता। ऐसे में उन्होंने कार से सड़क मार्ग से चंड़ीगढ़ रवाना होना बेहतर समझा।

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