मीट बैन किसी पर जबरन नहीं थोपा जा सकता:SC
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महाराष्ट्र में मीट की बिक्री पर प्रतिबंध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति पर जबरन प्रतिबंध नहीं थोपा जा सकता।
न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुंबई हाईकोर्ट के फैसले पर दखल देने से इंकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने जैन धर्म के पर्व ...पर्यूषण... के दौरान मुंबई में मीट की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के मुंबई नगर पालिका के फैसले पर रोक लगा दी थी।
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रतिबंध संबंधी फैसले का सहनशीलता के साथ सम्मान करना चाहिए और लोगों की संवेदनाओं को ध्यान में रखना चाहिए। पीठ ने जोर देते हुए कहा कि समाज के किसी वर्ग पर बैन नहीं थोपना चाहिए। समझदारी से काम लेना चाहिए।
कबीर के दोहे से समझाया
कोर्ट में जस्टिस टीएस ठाकुर ने संत कबीर के इस चर्चित दोहे ...कबीरा तेरी झोपड़ी, गल कटीयन केपास, जैसी करनी वैसी भरनी, तू क्यो भया उदास... के जरिए याचिकाकर्ता के वकील डॉ. मनीष सिंघवी को समझाने की कोशिश की।
इस दोहे का अर्थ है कि अगर घर कसाई के बगल में हो तो आपको दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि जैसा करोगे वैसा ही भोगोगे। न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने सिंघवी से कहा कि इसलिए आप क्यों दुखी हो रहे हैं।
सिंघवी जैन समुदाय के एक संगठन की ओर से पेश हुए थे। हालांकि सिंघवी ने इस बात पर जोर दिया कि जीव-जंतुओं पर थोड़ा दया भाव दिखानी चाहिए। उन्होंने कहा कि साल में एक-दो दिन के लिए मीट की बिक्री न होने से क्या बिगड़ जाएगा।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई ऐसे फैसले हैं जिनमें कहा गया है कि जानवरों के प्रति दया भाव दिखाने की जरूरत है। जवाब में पीठ ने कहा कि हमारा मानना है कि जानवरों पर करुणा या दया भाव त्योहारों के समय कुछ दिनों के लिए ही नहीं होनी चाहिए। ऐसा साल भर होना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि मीट पर प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक तौर पर मुश्किल है क्योंकि यह पैकेट में भी बिकता है।