फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   ayodhya someone snatched away by destiny and politics

किसी को नियति ने छीना, किसी को राजनीति ने

Thu, 06 Dec 2012 09:10 AM IST
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी Updated Thu, 06 Dec 2012 09:10 AM IST
विज्ञापन
ayodhya someone snatched away by destiny and politics

विवादित ढांचा ध्वंस हुए 20 साल गुजर गए। मालिकाना हक पर हाईकोर्ट का फैसला आए भी दो साल से ऊपर हो गए। चेहरे बदल गए, सियासत के मुद्दे बदल गए। नेताओं के सुर बदल गए और खेमे भी। सियासी सरोकार बदल गए। जो कहीं नहीं थे वे आगे आकर तर्क-वितर्क और बहस में दिखने लगे।

विज्ञापन


अयोध्या भी बदल गई और यहां के लोग भी। कुछ को नियति ने छीन लिया तो किसी को राजनीति व समय ने पीछे धकेल दिया। तीखे तेवरों पर उम्र हावी हुई तो गरजने वाले स्वर कमजोर पड़ गए। जो दूसरों को सहारा देते थे, खुद सहारे के मोहताज हो गए। जो नेतृत्व करते थे, नेपथ्य में चले गए या पीछे धकेल दिए गए।
विज्ञापन


मंदिर मुद्दे के सर्वाधिक दो चर्चित चेहरे महंत रामचंद्र परमहंस मंदिर निर्माण का सपना लिए ही संसार से विदा हो गए तो हाशिम अंसारी भी उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। आंदोलन को आशीर्वाद और मार्गदर्शन देने वाले देवरहा बाबा और विजयाराजे सिंधिया जैसी शख्सियतें भी नहीं रहीं। परदे के पीछे आंदोलन के सूत्रधारों में शामिल रहे नानाजी देशमुख भी मुद्दा सुलझने का इंतजार करते-करते ही चिरनिद्रा में सो गए।
विज्ञापन
विज्ञापन


आंदोलन का एक तीखा स्वर और बाबरी मसजिद के पक्ष में देश व विदेश तक के मंचों पर आक्रामक शैली में कानूनी और तकनीकी पक्ष रखने वाले सैय्यद शहाबुद्दीन भी समय और सियासत के चक्रव्यूह में उलझकर कहीं खो गए। विवाद नहीं सुलझना था तो नहीं सुलझा। कब तक सुलझेगा और सुलझेगा भी या नहीं, यह अभी किसी पक्ष को नहीं पता। मामले से जुड़े लोगों का मानना है कि न्यायालय के लिए इस मुद्दे पर कोई निर्णय करना बहुत आसान नहीं है।

कई चले गए, कुछ बदल गए  
हाशिम की तरफ से मुकदमा लड़ रहे वकील अब्दुल मन्नान मुकदमा जीतने की हसरत लिए दुनिया से चले गए। उनकी जिम्मेदारी जफरयाब जीलानी ने संभाली। न्यायालय में श्रीराम लला विराजमान के प्रमुख पक्षकार न्यायमूर्ति देवकीनंदन अग्रवाल नहीं रहे।  मंदिर मुद्दे को आंदोलन का रूप देने वालों में शामिल दाऊदयाल खन्ना नहीं रहे।

तल्ख टिप्पणियों के लिए पहचाने जाने वाले कानपुर के हरी दीक्षित भी नहीं रहे। मंदिर आंदोलन की रचना और उसका परदे के पीछे से संचालन करने वाले भाऊराव देवरस, पत्रकार भानुप्रताप शुक्ल, महेश नारायण सिंह, ओंकार भावे जैसे लोग भी दुनिया से चले गए। लखनऊ में मीडिया में अयोध्या आंदोलन की पल-पल खबर देने वाले गुलाब सिंह परिहार भी नहीं रहे।

श्रीशचंद्र दीक्षित, अशोक सिंहल, महंत अवैद्यनाथ, ऋतम्भरा के गुरु परमानंद जी महराज, स्वामी सत्यमित्रानंद, राम विलास वेदांती और मंहत नृत्यगोपाल दास, ठाकुर गुरजन सिंह जैसे लोगों पर उम्र हावी हो गई, तो विनय कटियार जैसे हिंदूवादी नेता पूरी तरह सियासी सफर के राही हो गए। मध्यप्रदेश के जयभान सिंह पवैया ने भी राजनीति की राह पकड़ ली। वर्ष 89 से 95 के बीच जिन ऋतम्भरा के भाषण सुनने के लिए लोग सड़कों पर आ जाया करते थे।

चुनाव के दिनों में जिनके भाषण और कैसेट भाजपा की प्रचार सामग्री का अनिवार्य हिस्सा हुआ करते थे। वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि अयोध्या आंदोलन में आग उगलने वाली साध्वी के मुंह से वात्सल्य ग्राम के माध्यम से अनाथ बच्चों पर दुलार-प्यार व लाड़ बरसने लगा।

तब नायक, आज वजूद का संघर्ष
मंदिर आंदोलन के नायक के रूप में उभरे कल्याण सिंह नियति और राजनीति के भंवर में ऐसे उलझे कि अपनी पूंजी ही नहीं, पहचान भी गंवा बैठे। साख पर सवाल अलग खड़ा हुआ। मंदिर मुद्दे पर अपने तेवरों से जिस भाजपा को उन्होंने आगे बढ़ाया, उसी से उन्हें बाहर होना पड़ा। एक नहीं दो-दो बार।

नियति का एक खेल यह भी कि जिस पार्टी की जड़ें सींचने के लिए कल्याण ने अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा लगा दिया था, उसी को दफनाने की बात भी उन्हीं कल्याण के मुंह से ही निकली। कल्याण की तरह भाजपा को बुलंदियों पर पहुंचाने में अपने भगवा तेवरों से योगदान करने वाली उमा को भी भाजपा से बाहर होना पड़ा।

90 के दशक में उमा भारती मध्य प्रदेश में अयोध्या आंदोलन खड़ा करने के लिए जानी जाती थीं। उनके नाम के गांव-गांव नारे लगते थे। उन्हीं उमा को भी समय के चक्रव्यूह ने ऐसा उलझाया कि वह उन लालकृष्ण आडवाणी पर ही बरस पड़ीं, जो उन्हीं की तरह अयोध्या आंदोलन को धार देने वालों में शामिल थे।

मध्य प्रदेश में दिग्विजय जैसे नेता से सत्ता छीनकर भाजपा की झोली में डालने के लिए जो लोग उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे, उनके आलोचक हो गए। भाजपा में वापसी हुई तो सारी धार गायब हो चुकी थी। अब उन्हें यूपी आकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

नहीं मिल पाया बहुत महत्व
‘मंदिर बनाने के लिए पहला फावड़ा मेरे सिर पर पड़ेगा’। इस बयान से हलचल पैदा करने वाले दिग्गज कांग्रेसी कमलापति त्रिपाठी थे। कम ही लोग जानते हैं कि कांग्रेस की तरफ से मंदिर के लिए कारसेवा के विरोध को स्वर देने का काम कमलापति ने ही किया था।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती शुरू से इस मामले में मुख्य भूमिका में रहे। न्यायालय में भी वह प्रमुख पक्षकार रहे। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान भी वह काफी सक्रिय रहे। लेकिन, संयोग कि उतनी चर्चा नहीं मिली। हाशिम अंसारी की तरह फैजाबाद के ही हाजी महबूब भी बाबरी मसजिद की तरफ से पक्षकार हैं। उनके पिता ने मुकदमा किया था, पर आज उनकी बहुत चर्चा नहीं होती।

अब नहीं दिखते वह तेवर
जिस दिन ढांचा ध्वंस हुआ उस समय भाजपा के दो नेता लालकृष्ण आडवाणी व डॉ. मुरली मनोहर जोशी विवादित परिसर में ही मौजूद थे। दोनों को कारसेवकों के गुस्से का सामना भी करना पड़ा था। पर, आज इन दोनों नेताओं के पहले जैसे तेवर नहीं दिखते।

भूमिका बदली
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल एक समय केंद्र सरकार में अयोध्या प्रकोष्ठ के प्रभारी थे। उन्हें इस विवाद के समाधान के लिए दोनों पक्षों से बातचीत करके समस्या के निराकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आज वह मंदिर के पक्ष में पैरोकार हैं।

कहते हैं, ‘वहां जो अनुभव व जानकारी मिली, उससे लगा कि मुझे मध्यस्थता के साथ-साथ इस मामले में पक्षकार भी बनना चाहिए। अपनी वर्तमान भूमिका से प्रसन्न व संतुष्ट हूं। धर्म का कार्य कर रहा हूं। मुझे लगता है कि न्यायालय में अभी 4-5 वर्ष लग जाएंगे। फिलहाल लोगों को सच्चाई बताने के लिए इन दिनों मैं अयोध्या का प्रामाणिक इतिहास लिख रहा हूं। दो खंडों की इस पुस्तक में इस मुद्दे पर वह सब कुछ होगा जो लोगों को सारे तथ्य बता सके।’

सियासी सुर बदले
नब्बे के शुरू में भाजपा राममंदिर निर्माण का ऐलान करके वोट मांगा करती थी। राममंदिर का निर्माण जिसके एजेंडे में था। बाद में सरकार चलाने की प्राथमिकता में इस मुद्दे को सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी जैसे शब्द देकर पल्ला झाड़ लिया। यह भी कहने लगी कि मंदिर तो संत-महात्मा बनाएंगे। उसने तो सिर्फ इसका समर्थन किया था। बोली और लोगों की भी बदली। बाबरी मसजिद के पक्ष में खड़े होने वाले मुलायम सिंह जैसे चेहरे सर्वमान्य हल की बात करने लगे।

...और अयोध्या भी बदल गई
चेहरे ही नहीं बदले अयोध्या भी बदल गई। जिस अयोध्या ने भाजपा को दूसरे प्रदेशों में पांव पसारने का मौका दिया। कई राज्यों सहित दिल्ली की सत्ता दिलाई। भाजपा को विशिष्ट पहचान दिलाई। वजह भाजपा नेताओं की बदलती जुबान रही या कुछ और, अयोध्या भी आज बदल गई।

कभी भगवा का डंका बजता था, वहां उस समाजवादी पार्टी के नगाड़े बजने लगे जिसके नेता मुलायम सिंह को अयोध्या का खलनायक माना जाता था। भाजपा के आंसू पोंछने के लिए विधानसभा की सिर्फ एक सीट रुदौली जैसे-तैसे मिली। कभी विनय कटियार को संसद पहुंचाने वाले अयोध्या के लोगों ने 2004 से भाजपा से ही मुंह मोड़ लिया

पक्ष दो राय एक
अभी तो सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई भी नहीं शुरू हुई। कब शुरू होगी पता नहीं। अब तो सब कुछ रामजी के ही ऊपर है। लेकिन, न्यायालय के लिए निर्णय ले पाना आसान नहीं है। हल संसद में कानून बनाने से ही निकलेगा। दूसरा रास्ता नहीं।--पुरुषोत्तम नारायण सिंह

 
हाईकोर्ट से फैसला आते-आते इतना वक्त गुजर गया। मामला अब सुप्रीमकोर्ट में है। कितना समय लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। खुदा जाने। अदालत के लिए इस मामले में फैसला ले पाना बहुत आसान काम नहीं है। मेरी उम्र अब ऐसी नहीं रही कि ज्यादा भागदौड़ कर सकूं।--हाशिम अंसारी

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed