ऑस्ट्रेलिया के 'गरीब' की भारत के सस्ते इलाज से बची जान
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वो बीमार था...मजबूर था...जिंदगी के लिए जूझ रहा था... लेकिन जिस दवाई से उसकी जिंदगी बच सकती थी, उस दवा को खरीदने के लिए उसके पास उतने पैसे नहीं थे। जब वो अपने ही देश में हर तरफ से निराश और हताश हो गया तो भारत में उसे उम्मीद की किरण नजर आई और आखिरकार उसकी जिंदगी बच गई।
यह कहानी है ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग जेफरी की। 61 वर्षीय जेफरी ऑस्ट्रेलिया के एक इतिहासकार और लेखक हैं। चार महीने पहले की बात है जब जेफरी लीवर सिरोसिस के कगार पर पहुंच गए थे।
उन्हें हेपेटाइटिस सी हुआ था और इस खतरनाक हालत से बाहर आने के लिए उन्हें सिवोल्दी नामक दवाई की जरूरत थी। लेकिन जेफरी उस वक्त मायूस हो गए जब उन्हें इस दवाई की कीमत का पता चला।
ऑस्ट्रेलिया में इस एक गोली की कीमत एक हजार ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से भी ज्यादा है। जेफरी को अपने पूरे इलाज के लिए 84 गोलियों की जरूरत थी, जिसकी कीमत करीब 1 लाख डॉलर पहुंच रही थी। ऐसी हालत में...
जेफरी को भारत में दिखी उम्मीद की किरण
जेफरी के पास इतनी रकम नहीं थी कि वो अपना इलाज करा सकें। ऐसी हालत में उन्हें भारत में उम्मीद की किरण नजर आई। अपने इलाज के लिए जेफरी 3 महीने पहले चेन्नई पहुंचे।
भारत में इस दवाई की कीमत ऑस्ट्रेलिया से दस गुना कम है। दवाई के जरिए फिर से अपनी जिंदगी में लौटे जेफरी ने बताया कि भारत में उन्हें अपने पूरे इलाज के लिए वही दवा सिर्फ 900 डॉलर में मिल गई।
उन्होंने बताया, 'जैसे ही मैंने इस दवाई को लेना शुरू किया, महज 11 दिनों के अंदर मेरा लीवर पहले की तरह ठीक हो गया। 4 हफ्तों के बाद जब मैंने जांच कराई तो मेर रक्त में एक भी वायरस नहीं मिला। अब जेफरी एकदम ठीक हैं लेकिन...
अब सबको भारत की बात बता रहे हैं जेफरी
जेफरी ने बताया कि वो लीवर सिरोसिस की कगार पर थे अगर एक बार आपको सिरोसिस हो गया तो फिर शरीर में कैंसर और ट्यूमर जैसी खतरनाक बिमारियां जन्म ले लेती है।
भारत की दवाई से जेफरी अब एकदम ठीक हैं लेकिन उनकी कहानी ने ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में एक बहस छेड़ दी है कि क्या जीवन रक्षक दवाओं की कीमत इतनी ज्यादा होनी चाहिए कि कोई उन्हें खरीद भी ना पाए।
जेफरी अब ऑस्ट्रेलिया में इस बीमारी से पीड़ित दूसरे लोगों को भारत की इस दवाई के बारे में बता रहे हैं। जेफरी के मुताबिक उन्हें हर रोज इस बीमारी से पीड़ित 40 से 50 लोगों के ईमेल मिलते हैं। ये वो लोग हैं जो हेपेटाइटिस सी से पीड़ित हैं और जिंदगी के लिए उस दवाई के इंतजार में हैं जिसकी कीमत उनके अपने देश में उनकी पहुंच से बाहर है।