{"_id":"dad04568-4e42-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"atal-bihari-vajpayee-fond-of-mathura-sweets","type":"story","status":"publish","title_hn":"जन्मदिन विशेष: पेड़े के दीवाने, ठंडई के शौकीन अटल","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
जन्मदिन विशेष: पेड़े के दीवाने, ठंडई के शौकीन अटल
हिमांशु त्रिपाठी/मथुरा
Updated Tue, 25 Dec 2012 10:46 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सियासत के शिखर पुरुष अटल विहारी वाजपेयी बढ़ती उम्र के साथ भले ही सुर्खियों से परे हैं, लेकिन ब्रजवासी उनकी यादें आज भी दिलों में संजोए हैं। पेड़े के दीवाने अटल, ठंडई के शौकीन अटल और ठहाके लगाते अटल की छवि ब्रजवासियों के नयनों में बसी है। 1957 के चुनाव में हारकर भी वह लोगों से इतना गहरा नाता लगा बैठे। मथुरा का जिक्र आने पर वह पेड़े की याद जरूर करते हैं।
विज्ञापन
मनमौजी, मस्त स्वभाव, हास परिहास प्रिय, हंसी के ठहाके और मधुर मुस्कान बिखेरने वाले अटल बिहारी वाजपेयी कान्हा की नगरी से खास प्रेम रखते हैं। उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव मथुरा से ही लड़ा। हार गए थे, हां हार गए और जमानत भी जब्त हो गई थी यह कहते हुए उनके संगी साथी ठिठक जाते हैं। फिर कहते हैं कि कोई बात नहीं तब प्रारंभ था, इसके बाद तो उन्होंने सियासत की जो पारी खेली उसकी कायल सारी दुनिया हो गई।
विज्ञापन
जनसंघ से जब उन्होंने मथुरा से चुनाव लड़ा तो यहां खूब घूमे। चाट-पकौड़ी खूब खाई। वाजपेयी के बेहद नजदीकी रहे वरिष्ठ भाजपा नेता बांके बिहारी माहेश्वरी कहते हैं कि मीसा में बंद रहने के दौरान वह पैरोल पर जब बाहर आए तो वह सीधे मथुरा आ गए। यहां के गांधी पार्क के बाहर उन्होंने प्रेम हलवाई के यहां कचौड़ी छककर खाई। दीनदयाल धाम से उनका गहरा नाता रहा। प्रधानमंत्री रहने के दौरान वह इसके संरक्षक रहे।
विज्ञापन
पक्ष-विपक्ष सबके प्रिय रहे राजनीतिज्ञ एवं कवि के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जिस कदर अलग शख्सीयत बन बैठे, जमाना उसका कायल है। सियासत से समय पर संन्यास लेकर उन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव तक कुर्सी से प्रेम करने वालों को एक पैगाम दिया। उम्मीदों भरी उनकी एक कविता....
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाईं से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ फिर से दिया जलाएं।।
पेड़े लाए हो...
उत्तर प्रदेश संगीत नाट्य अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी जब जवाहर लाल नेहरू की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर लौट रहे थे तो वहां राधा-कृष्ण तथा ग्वाल-बालों की वेशभूषा में सुसज्जित ज्ञानदीप मथुरा के बाल कलाकारों की ओर मुड़कर आ गए। मुस्कुराते हुए बच्चों से पूछा, मथुरा के पेड़े लाए हो? उस समय प्रधानाचार्य रहीं सविता भार्गव ने उन्हें पेड़े वाला डिब्बा भेंट किया।
दोने भर चासनी पी गए...
अपने जन्मस्थल ग्वालियर की एक घटना अटल अकसर ब्रजवासियों को सुनाया करते थे। जब वह छोटे थे तो ग्वालियर के करहल गांव में एक बाबा जी ने यज्ञ किया था। वाजपेयी भी वहां परिवार सहित पहुंचे। लौटने में इतनी देर हो गई कि रात में गांव में ही रुकना पड़ा। यज्ञ में इतनी अधिक भीड़ थी की वहां लगी दुकानों में खाने पीने का सारा सामान बिक गया। भूख से परेशान वाजपेयी से एक दुकानदार ने कहा, रसगुल्ले तो खत्म हो गए चासनी बची है। फिर क्या था दोने भर चासनी ली और उसे पी गए।
बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ
शांति बिना खुशियां हैं बांझ।
सपनों में मीत, बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।
- अटल विहारी वाजपेयी