जब तांगे के नीचे दब गए थे अटल बिहारी वाजपेयी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सत्तर के दशक में यूपी में मिरहची आए अटल जी कसबा निवासी लाला रामभरोसे के साथ तांगे से मारहरा जा रहे थे। ऊबड़ खाबड़ सड़क पर घोड़ा बिदका और तांगा असंतुलित होकर पलट गया। अटल बिहारी और लाला जी इसके नीचे दब गए। लेकिन किसी को गंभीर चोट नहीं आईं। यह बात खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन भाजपा सांसद डा. महादीपक सिंह शाक्य को बताई थी।
अटल तेरे नाम, कलक्टरगंज की शाम
‘हटिया खुली बजाजा बंद, झाड़े रहो कलक्टरगंज’ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने की घोषणा के बाद कनपुरियों ने यह नारा खूब बुलंद किया था। लोग कलक्टरगंज के उस तिराहे पर पहुंचे थे जहां 74/28 नंबर की गद्दी पर शाम को होने वाली बैठकी में अटल बिहारी अपने हम उम्र दोस्तों के साथ हंसी-ठहाका करते थे। अटल जी भी बात-बात में ‘झाड़े रहो कलक्टरगंज’ कहते थे।
जनसंघ के संस्थापकों में से एक अटल बिहारी का छात्र जीवन से ही कानपुर से गहरा रिश्ता था। तेरह दिन की सरकार में प्रधानमंत्री बनने के बाद वह सबसे पहले कानपुर आए थे। यहां उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर की के स्वर्ण जयंती समारोह का शुभारंभ किया था। अपने उस भाषण के बाद लोगों से बातचीत में उन्होंने कई बार कलक्टरगंज की यादों को भी ताजा किया था। राजनीति में सक्रिय होने के बाद वह जब भी कानपुर आए, स्वरूपनगर स्थित विहिप के प्रमुख पदाधिकारी रहे इंद्रजीत जैन के आवास पर ही रुकते थे। यहीं पर आजकल मुरली मनोहर जोशी रूका करते हैं।
मथुरा की सियासत में अटल के अनुभव
अटल बिहारी वाजपेयी का मथुरा को लेकर राजनीति का एक खट्टा अनुभव भी रहा है। देश की आजादी के बाद लोकसभा के दूसरे आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। उनका यह पहला चुनाव था।
बलरामपुर के साथ अटल बिहारी वाजपेयी मथुरा संसदीय क्षेत्र से भी चुनाव मैदान में उतरे। इस दौरान मथुरा संसदीय क्षेत्र से ही देश की आजादी में अहम किरदार निभाने वाले राजा महेन्द्र प्रताप भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। कांग्रेस ने प्रथम लोकसभा में मथुरा से प्रतिनिधित्व करने वाले किशन चंद्र अग्रवाल को मौका दिया था। देश के संसदीय इतिहास के पहले चुनाव में मात खा चुके राजा महेन्द्र प्रताप के सिर इस बार मथुरा की जनता ने कामयाबी का सेहरा बांध दिया। राजा महेन्द्र प्रताप के सामने अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी जमानत गंवानी पड़ी थी।
मुझे चौधरी अटलबिहारी और चौधरी साहब को वाजपेयी कहो ...
ये बात उन दिनों की है जब देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर अटल बिहारी वाजपेयी के साथ चौधरी चरण सिंह भी नगला चंद्रभान आए हुए थे। यहां जनसभा के दौरान देश की जाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अच्छा लगेगा जब मुझे चौधरी अटलबिहारी लोग कहें और चौधरी साहब को चरण सिंह वाजपेयी। जनसभा के बाद यहां दोनों ने जमीन पर बैठ कर पंगत में भोजन भी किया था।
वाजपेयी की खास पसंद मथुरा के पेड़े
सम्मान के शिखर पर विराजे पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की हंसी ठिठोली की गवाह ब्रज की गलियां हैं। कभी साइकिल तो कभी यमुना में नौकाविहार में उनकी मस्ती आज भी उनके मित्रों को याद है। मथुरा के पेड़े उनकी खास पसंद में शुमार हैं। प्रधानमंत्री रहने के वक्त यहां से जाने वाले लोग उनके लिए पेड़े जरूर ले जाते थे।
पेड़े के दीवाने अटल ठंडाई के भी शौकीन रहे हैं। यहां ठंडाई छानने के उनके कई किस्से हैं। उनके नजदीक रहे लोग बताते हैं कि यमुना तट पर ठंडाई छानकर वह अकसर नौकाविहार पर निकल जाया करते थे। मस्त अंदाज ही हर शख्स को उनका मुरीद बना देता था।
1957 के चुनाव में बेशक उनको यहां की सियासी जमीन पर हार नसीब हुई, लेकिन वह यहां के लोगों की आत्मीयता देख अटूट रिश्ता जोड़ बैठे। मथुरा का जिक्र आने पर वह पेड़े की याद जरूर करते हैं।
मनमौजी स्वभाव, कभी ठहाके तो कभी मीठी मुस्कान बिखेरने वाले अटलबिहारी वाजपेयी श्रीकृष्ण नगरी के वाशिंदों से अटूट प्रेम रखते हैं। उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव मथुरा से ही लड़ा। जमानत भी जब्त हुई, लेकिन यह ब्रज रज का महात्म्य उन्हें अपना मुरीद बना चुका था।
वाजपेयी के बेहद नजदीकी रहे वरिष्ठ भाजपा नेता बांकेबिहारी माहेश्वरी कहते हैं कि आपातकाल में जब अटलजी को पैरोल मिली तो वह सीधे मथुरा आ गए। गांधी पार्क पहुंचे और प्रेम हलवाई के यहां खूब मंगौड़े खाए। दीनदयाल धाम के भी वह प्रधानमंत्री रहने के दौरान संरक्षक रहे।
'भाई चासनी ही लाओ'
वाजपेयी जब यहां से चुनाव लड़ रहे थे तो वह ग्वालियर के किस्से दोस्तों को खूब सुनाया करते थे। जब वह छोटे थे तो ग्वालियर के करहल गांव में बाबा जी ने यज्ञ किया। वाजपेयी जी भी पूरे परिवार के साथ वहां पहुंचे। लौटने में देर हो गई तो रात गांव में ही रुकना पड़ा। यज्ञ में जुटी भीड़ आसपास की दुकानों के खाने-पीने का सामान खत्म कर चुकी थी। भूख से व्याकुल वाजपेयीजी से एक दुकानदार ने कहा रसगुल्ले तो खत्म हो गए चासनी बची है। वाजपेयी जी ने कहा भाई चासनी ही लाओ। इसके बाद दोना भरकर वह चासनी पी गए।
ग्वालियर और अटल
मूल रूप से आगरा के बटेश्वर क्षेत्र के रहने वाले कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षण कार्य के लिए ग्वालियर आकर शिंदे की छावनी के कमल सिंह के बाग में रहने लगे थे। यहीं पर उनकी पत्नी कृष्णा वाजपेयी ने अटल बिहारी वाजपेयी को जन्म दिया था। अटल की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा ग्वालियर में हुई। उन्होंने बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ग्वालियर के ही विक्टोरिया कालेज से प्राप्त की थी। ग्वालियर से वाजपेयी का करीबी नाता रहा है।
अटल के पैतृक घर को उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के समय से ही वाचनालय का स्वरूप दिया गया है। यहां आज भी पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन के लिए लोग नियमित आते हैं। यहां कंप्यूटर शिक्षण भी नि:शुल्क दिया जाता है।
शुक्रवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत रत्न के लिए तय होने के बाद यहां खुशी का माहौल है। लोगों का कहना है कि ग्वालियर की धरा अटलजी को भारत रत्न मिलने के बाद धन्य हो गई है। वह इस अंचल और मध्य प्रदेश से पहले शख्सियत हैं जिन्हें भारत रत्न मिला है।
ग्वालियर से हार की कसक रही हमेशा
अटलजी के करीबियों को उनके जीवन में 1984 का वह दौर नहीं भूलता जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में वाजपेयी ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने पर्चा भरे जाने के समय से कुछ क्षण पहले एक राजनीति के तहत पूर्व केंद्रीय मंत्री व ग्वालियर रियासत के प्रमुख माधव राव सिंधिया की उम्मीदवारी घोषित कर दी थी। इस कारण भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा था। अटलजी को ग्वालियर से हार की कसक हमेशा रही। वह अक्सर अपने नजदीकियों से हमेशा इसका जिक्र भी करते थे।
हिंदी भवन स्थापना की इच्छा
ग्वालियर में हिंदी भवन स्थापना की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की काफी इच्छा थी, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई है। एक बार मध्य भारत हिंदी साहित्य सभा के कार्यक्रम में उन्होंने यह इच्छा जाहिर की थी। मगर ग्वालियर के राजनेता उनकी यह इच्छा अब तक पूरी नहीं करा सके हैं।
1984 में सहारनपुर में मनाया जन्मदिन
जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा हुई थी तो सहारनपुर में भाजपाइयों की पुरानी यादें भी ताजा हुई थी। उन्हें 1998 के उस दिन की याद आ गई, जब अटल जी ने उनके बीच अपना जन्मदिन मनाया था और उन्होंने पार्टी फंड के लिए वाजपेयी को 50 हजार रुपये की थैली भेंट की थी।
सहारनपुर के भाजपा कार्यकर्ताओं से अटल बिहारी वाजपेयी का विशेष लगाव रहा है। उम्रदराज भाजपा नेताओं को आज भी 1984 का वह दिन याद है। जब अटल जी ने उनके बीच न केवल अपना जन्म दिन मनाया था, बल्कि जुबली पार्क में सभा को भी संबोधित किया था। अटल को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा के वक्त विशंभर नाथ बजाज ने बताया था कि जब अटल जी का स्वागत किया गया तो उन्होंने चुटकी ली कि भई मैं 60 साल का हो गया हूं। 60 वाला तो सठिया जाता है और आप लोग मेरा स्वागत कर रहे हैं।
जुबली पार्क की सभा में कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे कि देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो तो उन्होंने तब भी चुटकी ली कि भई अटल बिहारी जैसा क्यो, अटल बिहारी नेता क्यो नहीं हो सकता। भाजपा के बलदेव राज खुंगर भी उन क्षणों को नहीं भूल पाते, जब सभा संबोधित करने से पूर्व पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में अटल बिहारी वाजपेयी ने कार्यकर्ता के बीच खाना खाया था।
सरसावा शुगर फैक्ट्री के गेस्ट हाउस में रहे थे बंदी
श्रीराम जन्म भूमि जेल भरो आंदोलन के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी को सरसावा की दि किसान को-आपरेटिव शुगर फैक्ट्री के गेस्ट हाउस में रखा गया था। वे यहां 24अक्तूबर से पांच नवंबर तक रहे। बताया जाता है कि तत्कालीन सांसद काजी रशीद मसूद भी शिष्टाचार के नाते अटल जी से मिलने गए थे। उनकी एक झलक पाने को दिन भर गेस्ट हाउस के बाहर लोगों का तांता लगा रहा था।
टॉपर रहे हैं अटल जी
भारत रत्न पाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1946, 1947 में डीएवी पीजी कॉलेज में एडमिशन लिया और टॉपर बनकर निकले थे। डीएवी से ही उन्होंने एलएलबी का रिफ्रेशर कोर्स किया। खास बात यह रही कि अटल और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने एलएलबी के रिफ्रेशर कोर्स की कक्षाएं एक साथ पढ़ी थीं। पिता-बेटे डीएवी हॉस्टल के 104 नंबर कमरे में सादगी से रहते और खुद खाना बनाकर खाते थे। अपने कपड़े खुद धोते थे। डीएवी में पढ़ाई के दौरान ही अटल जी आरएसएस के संपर्क में आए और राजनीति से जुड़ गए। पांचजन्य में उनका लेख भी प्रकाशित होता था।
कुर्सी-मेज की अभी भी हैं यादें
अटल बिहारी वाजपेयी ने एमए राजनीति विज्ञान की पढ़ाई डीएवी के कमरा नंबर 20, 21 में की थी। जब एडमिशन लिया था, तब कलम, दवात रखने वाली मेज-कुर्सी थीं, जो आज भी हैं। इसको अटल जी की यादों से जोड़कर देखा जा रहा है।
गुरु का बहुत सम्मान करते थे
अटल बिहारी वाजपेयी का अपने शिक्षक डॉ. मदन मोहन पांडेय से गहरा लगाव था। जिस दिन गुरु क्लास लेने नहीं जाते थे, उस दिन अटल जी पुरानी साइकिल से 108/88 पीरोड गुरु जी के घर पहुंच जाते थे। जब गुरु नहीं मिलते थे तो उनकी पत्नी शारदा देवी से अनुमति लेकर घर के बाहर ही चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करने लगते थे।
यह सिलसिला तब तक चलता, जब तक गुरु आ नहीं जाते थे। सक्रिय राजनीति में आने और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल गुरु को नहीं भूले। नवंबर 2001 में डॉ. मदन मोहन पांडेय की मृत्यु हुई, तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी थे। मदन मोहन के बेटे केके पांडेय ने बताया कि प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर डीएम आए थे और पिता के पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण किया था। डॉ. मदन मोहन की बहू डॉ. शक्ति पांडेय डीजी कॉलेज में पढ़ाती हैं। उनका कहना है कि सास-ससुर अक्सर अटल जी की सादगी का गुणगान किया करते थे।
...ताजमहल में कोट के लिए चुना था नारंगी फूल
भारत रत्न से नवाजे गए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मुहब्बत के शाहकार ताजमहल में नारंगी रंग के गुलाब को अपने कोट में लगाने के लिए चुना था। तब 1977 में वह तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स केलघन के स्वागत को बतौर विदेश मंत्री आगरा आए हुए थे। प्रवेश द्वारा पर जेम्स केलघन ने उनका दिया हुआ पीले रंग का गुलाब लगाया था।
1977 में ताजमहल के संरक्षण सहायक रहे डा. आर के दीक्षित ने भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी यादें ‘अमर उजाला’ के साथ साझा कीं। बताया कि इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लियोनार्ड जेम्स केलघन को रिसीव कर तत्कालीन विदेशी मंत्री अटल बिहारी ही लाए थे। मुख्य प्रवेश द्वार पर अटल ने इंग्लैंड के प्रधानमंत्री को फूल दिए तो उन्होंने उसमें से पीले रंग का फूल लेकर लगाया। अटल ने अपने लिए नारंगी रंग का फूल चुना।
‘कमेंट नहीं करूंगा, मेरी कविता पढ़ना’
ब्रिटिश पीएम ने ताजमहल के मुख्य गुंबद तक डेढ़ घंटा बिताया। तब तक अटल स्थानीय मित्रों के साथ फोटोग्राफी कराकर ताज के रॉयल गेट पर कुर्सी पर बैठे रहे। इस दौरान एएसआई के डा. आरके दीक्षित ने उनसे बातें भी की थीं। विजिटर बुक पर हस्ताक्षर करने के आग्रह पर अटल ने हिंदी में अपने हस्ताक्षर किए थे, लेकिन न तो ताज पर कोई कमेंट लिखा और न ही अपना पद नाम। संरक्षण सहायक ने कमेंट के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि ताज पर उन्होंने कविता लिखी है, वह पढ़ लेना। डा. दीक्षित बताते हैं कि ब्रिटिश पीएम ने भी अटल की तरह ही केवल हस्ताक्षर ही किए।
मुशर्रफ के साथ नहीं देखा ताज
ताजमहल के शहर में 15 जुलाई 2001 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति रहे परवेज मुशर्रफ के साथ आगरा शिखर वार्ता की थी। तब मुशर्रफ ने पत्नी के साथ ताज का दीदार किया, लेकिन अटल इस कार्यक्रम से दूर ही रहे। विदेश मंत्री रहते हुए वह एक बार ही ताज आए।
‘कमला जैसी देश में मेरी और भी बहने हैं’
(भारत रत्न देने की घोषणा किए जाने के दिन अटल बिहारी वाजपेयी की छोटी बहन से की गई बातचीत)
मेरी भाई की सोच व्यापक है। एक बार मैंने एक व्यक्तिगत कार्य के लिए उनसे कहा तो बोले, कमला तुम्हारे जैसी देश में मेरी और भी बहनें हैं। यह कहना था पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की छोटी बहन कमला दीक्षित का। अटल को भारत रत्न दिए जाने पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि भाई साहब को यह सम्मान मिलना ही चाहिए।
अटल बिहारी के परिवार में उनकी पीढ़ी के अब दो ही सदस्य जीवित हैं। वे और उनकी बहन कमला। आगरा में रहने वाली कमला उनसे लगभग चार साल छोटी हैं। उम्र के इस पड़ाव पर स्मृति भी साथ नहीं दे रही है। फिर भी बातचीत में उन्होंने अटल के व्यक्तित्व के बारे में बताया था। उन्होने अटल को याद करते हुए बताया था कि घर-परिवार में वे खूब हिलेमिले रहे, लेकिन अपनी हैसियत से लाभ पहुंचाने के बारे में सोचा भी नहीं। एक बार वे घर पर आए थे। मैंने अपने बेटे की नौकरी के लिए कहा तो साफ जवाब दे दिया। ये लड़के पढ़ेलिखे हैं। नौकरी के लिए खुद प्रयास करें।
अपने बचपन को याद करते हुए कमला ने बताया था मैं उनसे छोटी थी। वे बड़ा रौब भी गांठा करते, लेकिन मैं उन्हें जवाब देने न चूकती। हां, कपड़ों को लेकर वह अक्सर टोका करते। कविता उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। देश के प्रधानमंत्री बन गए लेकिन सादगी और रहने का देशी अंदाज कभी न छोड़ा। भूल गए रावरंग, भूलगए डफली, याद रहा तीन रंग नून, तेल, लकड़ी। यह कहावत वह बहुत कहा करते। आज याद आ रही है। कल उनका जन्म दिन है। पूड़ी और खीर खाकर आज से ही मैं खुशी मनाने लगी। कल भी मनाऊंगी।