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आसुमल ने बेची चाय, शराब, फिर बन गए आसाराम

Mon, 02 Sep 2013 06:42 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Mon, 02 Sep 2013 06:42 PM IST
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asaram used to sell tea and wine

नाबालिग से दुष्कर्म मामले में गिरफ्तार हो चुके आसाराम बापू खुद को भगवान का यार या दूत बताते हैं लेकिन उनकी कहानी एक सामान्य इंसान की ही है।

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आसाराम बापू का असली नाम आसुमल सिरूमलानी है। उनका आरंभिक जीवन बहुत सामान्य रहा है।

पाकिस्तान से हिंदुस्तान आने के बाद उन्होंने कई काम किए और फिर धर्म के प्रचार में उन्हें सफलता मिली।

चाय की दुकान से काम शुरू करने वाले आसाराम के इस समय 425 से अधिक आश्रम, 50 से अधिक गुरुकुल और करीब 10 करोड़ रुपए प्रतिमाह आय है।
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पहले चाय बेची और फिर शराब
अविभाजित भारत के बैरानी (अब पाकिस्तान) गांव में 17 अप्रैल 1941 को आसुमल का जन्म हुआ था। तब उनके पिता परचून की दुकान चलाते थे। ज्यादा आमदनी नहीं थी।

विभाजन के बाद वे भारत आए तो अहमदाबाद के मणिनगर इलाके में ठिकाना मिला। वहां पहले परचून की और फिर चाय की छोटी सी दुकान शुरू की। पिता को यहां महसूस हुआ कि बच्चे को पढ़ाना भी चाहिए। दो तीन साल तक स्कूल गए। पिता का निधन का हो गया।


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गुजारे के लिए दुकान ही एक जरिया थी। रिश्ते के एक भाई के साथ उसे देखने लगे। एक पुलिस केस के चलते बाद में आसुमल सरदारनगर चले गए।

सरदारनगर में आसुमल ने अपने कुछ साथियों के साथ शराब का धंधा भी शुरू किया। तीन-चार साल तक शराब का धंधा करने के बाद उन्होंने ये काम छोड़ दिया। फिर दूध की दुकान पर नौकरी शुरू की और फिर गायब हो गए।

तीर्थों में तलाशा भविष्य
छोटी उम्र मे विवाह और फिर आश्रम के सपने के साथ धर्म व्यवसाय का सपना देखते हुए बापू ने जो यात्रा शुरु की तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

तस्वीरों में देखिए:- जूते-चप्पलों तले आसाराम बापू

तीर्थों में अपने भविष्य को तलाशते हुए वृंदावन में स्वामी लीलाशाह को अपना गुरु बनाया। लीलाशाह ने नए शिष्य को नाम दिया-आसाराम।

दीक्षा के बाद घर लौट आने पर कहा कि आज के समय में घर-परिवार में रहते हुए ही अध्यात्म साधन करना श्रेयस्कर है। आसुमल से आसाराम बने बापू इसके बाद सीधे मणिनगर आ गए।

यहां आकर उन्होंने कारोबार में फिर भी दिलचस्पी नहीं ली। पांच छह साल तक की गई यात्राओं में हुए अनुभवों और सीखे सिद्धांतों को बांटना शुरू किया।

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1971 में अहमदाबाद में स्वामी सदाशिव के आश्रम में आकर रहने और बाद में अपना अलग संस्थान शुरू करने पर बापू को मणिनगर के कुछ व्यवसायियों का सहयोग मिला।

धीरे-धीरे बढ़ाया धर्म का व्यवसाय
शुरुआती दिनों की बात करें तो उनका पहला कार्यक्रम मार्च 1989 में दिल्ली के बिड़ला मंदिर में हुआ था। तब चैत्र नवरात्रियों में मानस मर्मज्ञ पंडित रामकिंकर उपाध्याय के प्रवचन हुआ करते थे। रामनवमी को उनके प्रवचन पूरे हुए और अगले दो दिन बापू वहां की व्यासपीठ से बोले।

श्रोताओं की तलाश रामकिंकर जी को सुनने आए लोगों में से ही की गई। उनका प्रवचन पूरा होने के बाद जब लोग वापस जा रहे होते थे तो बापू के कार्यकर्ता नवरात्र के बाद अपने गुरु के कार्यक्रम में आने का न्योता देते। काफी मेहनत मशक्कत के बाद दो दिन के कार्यक्रम में डेढ़-दो सौ श्रोता आए।

करीब पांच साल बाद लालकिला मैदान में बापू का सत्संग कार्यक्रम हुआ। सितंबर 1994 में हुए इस कार्यक्रम में पांच-सात हजार लोग सुनने के लिए मौजूद थे। इसके बाद शिष्य परिवार इस कदर फैला कि साल में दो-दो तीन-तीन आयोजन करने पड़े। अब बापू के अनुयायियों की संख्या पंद्रह करोड़ से ज्यादा बताई जाती है।


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