बिहार में ओवैसी की किरकिरी, पप्पू भी लुढ़के
कोशिश तो महागठबंधन को मजा चखाने की थी, मगर खुद अपनी किरकिरी करा बैठे। बिहार विधानसभा चुनाव में अलग पार्टी बनाने वाले पप्पू यादव और पहली बार किस्मत आजमाने उतरी असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही। दोनों ही पार्टियां बड़े-बड़े दावों के बीच खाता खोलने में भी कामयाब नहीं हो पाई।
दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश-लालू की सीधी लड़ाई में मतदाताओं का इन दलों का किस्मत आजमाना रास नहीं आया। दोनों ही सांसदों को पिछड़ी जाति और मुसलमान मतदाताओं ने शक की निगाह से देखा। इन पर भाजपा के इशारे पर चुनाव मैदान में उतरने के आरोप लगे थे।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में खाता खोल कर देश को चौंकाने वाले ओवैसी बिहार में ऐसा नहीं कर पाए। उनकी पार्टी के सभी छह उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। ओवैसी ने पहले मुस्लिम प्रभाव वाली सीमांचल की सभी 23 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी।
यादवों को नहीं लुभा पाए पप्पू
हालांकि भाजपा से मिलीभगत के आरोपों के बाद ओवैसी ने महज 6 उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में उतारे। इसी प्रकार चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी बना कर महागठबंधन को झटका देने की कोशिश की।
भाजपा के रणनीतिकारों को लगता था कि कोसी, सीमांचल और अंग क्षेत्र के कुछ सीटों पर पप्पू की बदौलत यादव मतदाताओं को बांटा जा सकता है।
हालांकि पप्पू को भी ओवैसी की तरह मतदाताओं का भारी विरोध झेलना पड़ा। पप्पू की पार्टी के 50 से अधिक उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे, मगर इनमें से एक भी जीत हासिल करना तो दूर प्रभावी प्रदर्शन भी नहीं कर पाए।