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क्या 'आप' के बेताज बादशाह हैं अरविंद केजरीवाल?

Wed, 04 Mar 2015 12:12 PM IST
Updated Wed, 04 Mar 2015 12:12 PM IST
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arvind kerjiwal is only king of aam aadmi party?

दिल्ली में सरकार चलाने वाली आम आदमी पार्टी में पुराने मतभेद फिर उभर कर सामने आ गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 'आप' के बेताज बादशाह हैं केजरीवाल?

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दोबारा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल और उनके क़रीबी सहयोगी योगेंद्र यादव के बीच आपसी तकरार ने आम आदमी पार्टी को टूटने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। दिल्ली विधान सभा चुनाव में भारी जीत के एक महीने बाद इस झगड़े की वजह से पार्टी को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
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पढ़िए पूरा विश्लेषण
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल एक तरफ और योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण दूसरी तरफ। दोनों खेमों में झगड़े उसी तरह से हो रहे हैं जैसे एक परिवार के अंदर नादान बच्चे करते हैं। आम आदमी पार्टी से हमदर्दी रखने वाले कहेंगे कि ये एक परिवार के अंदर भाइयों का आपसी झगड़ा है जिससे अधिक परेशान होने की ज़रूरत नहीं।
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आपसी उठापटक हर पार्टी में होती है

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दूसरी तरफ कुछ लोग कह सकते हैं कि ये एक नई पार्टी की शुरुआती मुश्किलें हैं। एक राय ये भी हो सकती है कि आपसी उठापटक हर पार्टी में होती है। जनता दल (यू) में मांझी और नीतीश कुमार के आपसी झगड़े का नज़ारा सबने हाल ही में देखा है।

लेकिन क्या हम भारतीय जनता पार्टी के अंदर दो सबसे अहम शख्सियतें नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच आपसी झगड़े की फिलहाल कल्पना कर सकते हैं? पार्टी की दिल्ली इकाई में दिल्ली चुनाव से पहले एक संकट उस समय ज़रूर आया था जब चुनाव में किरण बेदी को 'ज़बरदस्ती' मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में थोप दिया गया था।

किरण बेदी के आने से पार्टी के कुछ नेता और हज़ारों कार्यकर्ता नाराज़ हुए लेकिन किसी बड़े नेता ने खुलकर इसका विरोध नहीं किया। इसी तरह से कांग्रेस में भी मतभेद होते रहते हैं लेकिन नाराज़ नेता मीडिया में जाकर इंटरव्यू देने से अक्सर परहेज़ करते हैं।

'आप' में आपसी मतभेद से दिल्ली के अधिकतर मतदाता क्या सोच रहे होंगे जिन्होंने इस पार्टी को दूसरी बार भारी बहुमत से मौक़ा दिया। लेकिन 'आप' के नेताओं की आपसी तकरार और अपरिपक्वता ने दिल्ली की जनता को ज़रूर मायूस किया होगा।

मतभेद है क्या?

arvind kerjiwal is only king of aam aadmi party?

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खेमे से पार्टी नेता आशुतोष ने एक ट्वीट में कहा है कि ये विचारों का टकराव है। योगेंद्र यादव की 'लेफ्ट विचारधारा' और अरविंद केजरीवाल की 'व्यावहारिक कार्य प्रणाली' के बीच एक तकरार है।

अब तक 'आप' के नेताओं के हवाले से जो बातें सार्वजनिक हुई हैं और हमारी बातें पार्टी नेताओं से हुई हैं, उसके आधार पर ये कहना ग़लत नहीं होगा कि ये विचारों के संघर्ष के साथ-साथ अहम की लड़ाई भी है।

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण चाहते हैं कि पार्टी उन्हीं कथित सिद्धांतों पर चले जिन पर उसकी स्थापना हुई थी। पारदर्शिता उनमें से एक है। अरविंद केजरीवाल ये विचार रखते हैं कि राजनीति की व्यावहारिकता का ध्यान भी रखना पड़ेगा। उनके अनुसार, विचारों में हालात के हिसाब से लचक आनी चाहिए।

आप के बेताज बादशाह

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अरविंद केजरीवाल आज 'आप' के बेताज बादशाह हैं। वो इस पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के एकमात्र स्टार हैं। आप में उठ रही आवाज़ को अना की लड़ाई बताया जा रहा है। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को शायद इससे जलन भी होती हो लेकिन उनके इस तर्क में दम है कि 'आप' दूसरी पार्टियों से अलग है जहां शख़्सियत-परस्ती का बोलबाला है और ये कि अरविंद केजरीवाल भी उसी 'पर्सनालिटी कल्ट' का शिकार होते जा रहे हैं।

अब आगे होगा क्या? इसे अहम की लड़ाई कहें या विचारों का टकराव, ऐसा साफ़ नज़र आता है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण अब भी 'एक्टिविस्ट' की सोच से जुड़े हैं जबकि केजरीवाल अब एक चतुर सियासी नेता के रूप में उभरे हैं जो राजनीतिक समझौता करने को तैयार हैं।

'आप' का जन्म आंदोलन से हुआ था। लेकिन अब दो बार चुनाव में जीत के बाद इसका सियासी क़ाफ़िला आगे बढ़ रहा है। 'आप' का कारवां राजनीतिकरण की तरफ तेज़ी से चल पड़ा है। इसका नेतृत्व अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं और करते रहेंगे- वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ़ रियलपोलिटिक।

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