कलह के बीच केजरीवाल ने क्या-क्या खोया?
आंतरिक लोकतंत्र की मांग पर कलह में डूबी आम आदमी पार्टी ने देश में वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं को बहुत दूर धकेल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आप के अंदर की लड़ाई ‘सत्ता को व्यक्ति विशेष पर केंद्रित करने बनाम सत्ता के विकेंद्रीकरण’ की है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी को व्यक्ति केंद्रित बनाने की मुहिम चलाकर भविष्य की नई राजनीति की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया है। इस कारण जेपी आंदोलन के बाद एक बार फिर से लोगों का वैकल्पिक राजनीति से मोहभंग होगा।
उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी देशव्यापी जंग के बीच आप के उदय ने देश में नई राजनीति की संभावना को जन्म दिया था। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार उतरी इस पार्टी ने अपने प्रदर्शन से देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। दिल्ली में हुए मध्यावधि चुनाव में आप के प्रचंड बहुमत हासिल करने से देश में राजनीति की नई धारा बहने की उम्मीदों को और मजबूती मिली थी। लेकिन सत्ता हासिल होने के बाद आंतरिक कलह में घिरी आप से लोगों का मोहभंग तेजी से हो रहा है।
'जनता के एक बार फिर होगा मोहभंग'
प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. इम्तियाद अहमद कहते हैं कि केजरीवाल के समक्ष आंदोलन की तरह पार्टी को भी प्रजातांत्रिक ढंग से चलाने की बड़ी चुनौती थी। इससे पार पाने के लिए उन्होंने अन्य दलों की तरह सफलता का शार्टकट अपनाया। वह खुद को सत्ता का केंद्र बनाए रखने के लोभ से बचा नहीं पाए।
अहमद के मुताबिक, सत्ता के विकेंद्रीकरण, आंतरिक लोकतंत्र की मांग कर रहे प्रो. आनंद कुमार, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव की मांग नई और वैकल्पिक राजनीति को मजबूत करने का एक व्यापक दृष्टिकोण है। जबकि इस मामले में केजरीवाल का दृष्टिकोण संकुचित है। यह भारतीय राजनीति में आप को बड़ी छलांग मारने नहीं देगा और देश की जनता का एक बार फिर मोहभंग होगा। अहमद आप के आंतरिक फसाद को जनता पार्टी में हुए फसाद से जोड़ते हुए कहते हैं कि तब भी झगड़े की जड़ यही थी। तब एक बड़े धड़े ने केजरीवाल की तरह संकुचित दृष्टिकोण अपना कर जनता पार्टी को तबाह कर दिया था।
प्रो. असगर वजाहत इस फसाद की दूसरी वजह बताते हैं। उनका कहना है कि कई विचारधारा के लोगों ने आप के रूप में एक दल का गठन तो कर लिया, मगर पार्टी की विचारधारा, दृष्टि, भावी योजना की राह तय नहीं कर पाए। इस दल ने मुख्यधारा की राजनीति से मोहभंग का फायदा उठाते हुए सत्ता तो हासिल कर ली, मगर इस दौरान सामाजिक, आर्थिक और विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपनी दृष्टि तय नहीं की। बकौल वजाहत अगर केजरीवाल थोड़े ‘पढ़े लिखे’ और परिपक्व होते तो इन मुद्दों की पहले से तैयारी करते। चूंकि केजरीवाल महज सत्ता हासिल करने का लक्ष्य लेकर चले थे, इसलिए अन्य महत्वपूर्ण चीजें पीछे छूट गईं।