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'गांधी थे पहले कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ'

Sun, 22 Mar 2015 08:41 PM IST
Updated Sun, 22 Mar 2015 08:41 PM IST
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Arundhati roy comments on gandhi.

लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय का कहना है कि ''इस देश के पहले कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ मोहनदास करमचंद गांधी थे और वो कॉरपोरेट बिरला थे।''

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कॉरपोरेट घरानों की इस देश की राजनीति, समाज और कला साहित्य को प्रभावित करने की कोशिश कोई नयी बात नहीं है।

रॉय के अनुसार जो काम आज अंबानी, वेदान्ता, जिंदल या अडानी कर रहे हैं वो पहले भी बिरला या टाटा जैसे घराने करते ही थे।

लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने ये बातें शनिवार को दसवें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि कहीं। उन्होंने गांधी को ‘जातिवादी’ बताने वाले अपने पुराने बयान को फिर से दोहराते हुए कहा की किसी व्यक्ति की अंध भक्ति ठीक नहीं।
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गांधी जी का लेखन है आधार

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हालांकि उनके भाषण के बाद प्रश्न सत्र में बड़ी संख्या में वहां मौजूद दर्शकों ने इस बाबत पर जब ढेरों सवाल दागे तो उन्होंने कहा की उनके ये विचार 1909 से 1946 तक के खुद गांधी जी के लेखन के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष हैं।

इस मौके पर उन्होंने खासतौर पर मीडिया, साहित्य और कला के क्षेत्र में कॉरपोरेट की बढ़ती घुसपैठ पर जम कर हमला बोला। उन्होंने कहा कि जो काम बरसों से फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन कर रहे थे वही काम अब भारतीय कॉरपोरेट घराने करने लगे हैं।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रश्दी की अभिव्यक्ति की आजादी पर बहुत बहस होती है लेकिन छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के अधिकारों पर कोई बात नहीं होती क्योंकि ऐसे उत्सवों के प्रायोजक यही कॉरपोरेट हैं जो उन गरीबों के हितों पर डाका डाल रहे हैं।

पूंजीवाद है खतरनाक

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अरुंधति ने जातिवाद को पूंजीवाद जितना ही खतरनाक बताते हुए कहा की 90 प्रतिशत कॉरपोरेट बनियों के नियंत्रण में हैं और मीडिया में ब्राह्मणों और बनियों का ही वर्चस्व है।

समाज से लेकर राजनीति तक हर कहीं ऐसे ही जाति समूह दिखाई देते हैं। समाज को विभाजित करने वाली इस ताकत के खिलाफ भी प्रतिरोध की लड़ाई लड़नी होगी।

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि जिन सच्चाइयों को कॉरपोरेट और उसका समर्थक सूचना तंत्र दबाने और छिपाने में लगा है उसे प्रतिरोध के सिनेमा ने मंच दिया है।

इस मौके पर मौजूद मशहूर फिल्मकार संजय काक ने कहा कि डॉ़क्यूमेंट्री फिल्मों के लिए ये बेहतर दौर है। इस फेस्टिवल ने साबित किया है कि बेहतर फिल्मों के लिए एक पब्लिक स्फेयर मौजूद है जो पब्लिक डोनेशन की ताकत से कामयाब भी हो सकता है।

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आयोजन का दसवां साल

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दस साल पहले एक प्रयोग के तौर पर शुरू हुआ गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल अब राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान बन चुका है।

हालांकि शुरुआत से ही नियमित तौर पर शिरकत कर रहे एक दर्शक वर्ग का ये भी मानना है की जन संस्कृति मंच के जुड़ाव के साथ जबसे इस फिल्म फेस्टिवल की तासीर बदली तबसे आम लोगों की दिलचस्पी घटी है।

23 मार्च तक चलने वाले इस तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव में 10 फिल्मों की प्रस्तुति के अलावा मीडिया और सिनेमा में लोकतंत्र और सेंसरशिप पर पैनल चर्चा और नेपाल के सिनेमाई और सांस्कृतिक परिदृश्य पर भी चर्चा होगी।

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