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42 साल तक अरुणा को नहीं होने दिया एक भी घाव

Mon, 18 May 2015 10:04 PM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल / अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 18 May 2015 10:04 PM IST
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Aruna Shanbaug passes away in mumbai

बलात्कार के बाद मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल में पिछले 42 साल से कोमा में भर्ती 60 वर्षीय नर्स अरुणा शानबाग तो चली गई लेकिन उनके साथ लंबा वक्त गुजारने वाले एक-एक पल को आज भी याद करते हैं।

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छप्पन वर्षीया अर्चना भूषण जाधव ने उसी साल यानि 1973 में मुंबई के किंग एडवर्ड मेडिकल अस्पताल के नर्स ट्रेनिंग कॉलेज में दाखिला लिया था जिस साल वहां की एक नर्स अरुणा शानबाग पर वहीं काम करने वाले एक व्यक्ति सोहनलाल वाल्मीकि ने उनका गला घोंटा, दुष्कर्म किया और बाद में मरा हुआ समझकर छोड़कर चला गया।
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अर्चना ने अरुणा के साथ कभी काम नहीं किया लेकिन वो बताती हैं कि अरुणा बेहद खूबसूरत थीं और काम में बहुत सक्षम। अर्चना को उस वक्त की बहुत बातें याद नहीं, लेकिन बस इतना याद है कि वहाँ काम करने वालों ने हड़ताल की थी और इस घटना का विरोध किया था।

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कोर्ट ने की थी अस्पताल की सराहना

Aruna Shanbaug passes away in mumbai

अरुणा शानबाग पर किताब लिख चुकीं पिंकी वीरानी ने याचिका दाख‌िल की थी कि अरुणा को इच्छा मृत्यु दे दी जाए पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने अस्पताल के नर्सों और स्टॉफ की प्रशंसा की थी, जिन्होंने पिछले 42 सालों से अरुणा की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी, उनका इतना ध्यान रखा है कि अरुणा को इतने सालों तक बिस्तर पर लेटे रहने के बावजूद एक भी घाव नहीं हुआ।

पीढ़ियां बदलती रहीं पर अरुणा वहीं रहीं

Aruna Shanbaug passes away in mumbai

किंग एडवर्ड मेडिकल अस्पताल के डीन डॉक्टर संजय ओक 1986 से 88 तक इसी कॉलेज के छात्र  थे। अक्टूबर 2008 में पदभार संभालने के बाद उन्होंने उसी दिन अरुणा को देखा था। उन्होंने बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा था, "आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मुझे उनका आशीर्वाद मिला है ताकि यहाँ पर चल रहा अच्छा काम जारी रखा जा सके। पीढ़ियां बदल गई हैं। कई साल गुज़र चुके हैं। अरुणा के साथ काम करने वाले रिटायर हो गए,

लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि ये लोग रिटायर होने के बाद भी अस्पताल वापस आते रहे उनसे मिलने, उनका हाल चाल जानने। वो घर से अरुणा के लिए खाना लाते रहे। हमारे यहां जैसे एक परंपरा सी हो गई थी, हर साल जब नर्सिंग के छात्रों का नया जत्था आता है तो हम  उन्हें अरुणा के कमरे में ले जाते रहे। उन्हें अरुणा से मिलवाया जाता रहा।

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