फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   army is saving people trapped in flood in jammu and kashmir

अपनों की आवाज सुनने को कान तरस गए...

Wed, 10 Sep 2014 01:05 PM IST
Updated Wed, 10 Sep 2014 01:05 PM IST
विज्ञापन
army is saving people trapped in flood in jammu and kashmir

कश्मीर में आसमान से बरस रही मुसीबत तो फिलहाल रुक गई है, लेकिन जमीन पर बनी पहाड़ सी मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। संचार सुविधाएं ध्वस्त हो जाने से सबसे ज्यादा मुश्किल हो रही है। दूसरे राज्यों से आए जो लोग कश्मीर के सैलाब में फंसे हैं उनका अपने घरवालों से चार दिन से कोई संपर्क नहीं पा रहा है।

विज्ञापन


टीवी पर बाढ़ के विकराल हाल देखकर ये सब लोग अपनों की सलामती जानने के लिए बैचेन हैं। अखबार के दफ्तरों में सैंकड़ों की तादाद में ऐसे फोन आ रहे हैं जिनमें अपनों की खोज-खबर दिलाने में मदद की गुहार की जा रही है। ऐसे लोगों में सैलानी, सरकारी कर्मचारी, निजी कंपनियों के नुमाइंदे, सेना के जवान, ट्रक और टैक्सी ड्राइवर शामिल हैं।
विज्ञापन

जो वापस लौटे उनकी खुशी का कोई ठ‌िकाना नहीं

army is saving people trapped in flood in jammu and kashmir

सेना द्वारा जम्मू, चंडीगढ़ या अन्य स्थानों पर जो लोग पहुंचाए गए हैं उनके घरवालों की खुशी का तो कोई ओर-छोर ही नहीं है। ग्वालियर के दिनेश गुप्ता के कुछ रिश्तेदार श्रीनगर के इंदिरा नगर में फंसे हैं। भोपाल के मोहन त्यागी बेटा अपनी पत्नी के साथ कश्मीर घूमने आया था।

आखिरी बार गुलमर्ग से बात हुई थी तबसे कोई अता-पता नहीं है। राजस्थान के झुंझनू के राकेश शर्मा अपने दोस्तों के साथ घूमने आए थे। उनके घरवाले भी बेहद परेशान हैं। इन सबका कहना है कि सैलाब में फंसे अपनों की आवाज सुनने के लिए हमारे कान तरस गए हैं।

टीमें लगातार पीड़ितों तक पहुंचने की कोशिश में

army is saving people trapped in flood in jammu and kashmir

अपनों के लिए घबराहट बढ़ती ही जा रही है। बाहरी राज्यों के ऐसे लोगों के घरवालों को रियासती सरकार के साथ-साथ अपनी राज्य सरकार से भी शिकायत है कि उनकी परेशानी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कश्मीर में बाढ़ पीडितों को दर्द से निजात नहीं मिल पा रही है।

सेना और एनडीआरएफ की टीमें लगातार पीड़ितों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं लेकिन हालात और मकानों का ढ़ांचा इसमें बाधक बन रहा है। सीमेंट के मकानों में छतों पर आश्रय लिए लोगों तक हेलीकाप्टर से मदद पहंचाना आसान है लेक‌िन श्रीनगर में बड़ी संख्या में मकान के ऊपर टीन या पत्थर की ऐसी छतें हैं जो दोनों तरफ से ढ़लान की शक्ल में हैं।

ऐसे मकानों में कैद लोग हेलीकाप्टर से नजर नहीं आते। कुछ पीड़ित खिड़कियों से हाथ हिलाकर मदद के लिए सेना के जवानों का ध्यान आकर्षित करने को कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनतक राहत सामग्रियों के पैकेट भी नहीं पहुंचाए जा सके हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed