आए दिन सड़कें न तोड़ी जाएं, सुप्रीम कोर्ट से गुहार
सड़कें बनाना और उसकेबाद समय-समय पर विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा विकास कार्य केनाम पर सड़क की खुदाई और फिर उसका पुनर्निर्माण। यह कहानी सिर्फ किसी एक शहर तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश में यही हाल है।
सरकारी एजेंसियों में आपस में तालमेल नहीं होने के कारण सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मसले को लेकर एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका पर सोमवार को सुनवाई होगी।रोशन चपागेन द्वारा दाखिल इस याचिका में कहा गया है कि विकास कार्य केनाम पर सरकारी एजेंसी बनाती कम हैं और बिगाड़ती ज्यादा हैं।
सड़कें बनाई जाती है लेकिन कभी पीएनजी पाइपलाइन केनाम पर तो कभी ऑप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने या मरम्मत केनाम पर, कभी पानी की पाइप लाइन बिछाने या मरम्मत के नाम पर सड़कें तोड़ी जाती हैं। एक सरकारी एजेंसी का काम खत्म होता है तो दूसरी एजेंसी अपना काम शुरू कर देती है।
कभी पानी तो कभी की पाइपलाइन के लिए तोड़ी जाती हैं सड़कें
याचिका में कहा गया कि सड़कों पर गड्ढे होने के कारण हजारों दुर्घटनाएं
होती है और लोगों की जान जाती है। सड़कों पर गड्डों और निर्माण कार्य की
वजह से वजह से वर्ष 2014 में करीब 11000 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था।
इनमें उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लोगों की जानें गईं। याचिका में सड़कों
की बार-बार खुदाई से बचने के लिए यूटिलिटि कॉरिडोर बनाने की गुहार की गई है
जिससे कि सड़कों को नुकसान न हो।
याचिका में यह भी कहा गया कि इसकेलिए
सड़कों पर इंटरलॉकिंग ब्लॉक की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कि काम केवक्त
उसे हटा कर रख दिया जाए और काम खत्म होने के बाद उसे वापस उसी जगह पर रख
दिया जाए और इससे बनी सड़कों की लाइफ पांच सौ साल होती है।