उर्दू में गीता का पैगाम देता एक शायर
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शायर अनवर जलालपुरी ने हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद गीता और उर्दू भाषा के मेल का अनोखा कारनामा कर दिखाया है। पिछले दिनों अनवर की किताब 'उर्दू शायरी में गीता' का लोकार्पण मुरारी बापू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया।
गीता को उर्दू शायरी की शक्ल देने की वजह पूछने पर उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "मेरे दिमाग़ में 1983 के आसपास ये बात आई कि मैं गीता पर रिसर्च करूं, लेकिन जब मैंने काम शुरू किया तो यह इतना विस्तृत विषय हो गया कि मैंने सोचा कि मैं ये काम कर नहीं पाऊंगा।"
इसके बाद अनवर ने इसका रुख़ बदल दिया। उन्होंने बताया, "मैं चूंकि शायर हूं इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं पूरी गीता को शायरी बना दूं, तो यह ज़्यादा अहम काम होगा।"
अनवर की शायरी उनकी अपनी भाषा उर्दू में है लेकिन ये किताब उन्होंने अरबी-फ़ारसी लिपि के साथ ही देवनागरी लिपि में भी छपवाई है।
गीता को उर्दू में ढालना मुश्किल काम था
अनवर बताते हैं, "मैंने संस्कृत का श्लोक पढ़ा। ज़ाहिर है श्लोक तो सौ फ़ीसदी मेरी समझ नहीं आया, लेकिन उसका नीचे जो हिंदी अनुवाद था उसको मैंने पढ़ा। फिर मैंने उसी श्लोक का उर्दू और अंग्रेजी में अनुवाद भी पढ़ा।"
अनुवाद पढ़ने के बाद उन्होंने इन श्लोकों की पूरी व्याख्या पढ़ी। उन्होंने जिन लोगों की टीका पढ़ी उनमें ओशो रजनीश, महात्मा गांधी, विनोवा भावे और बाल गंगाधर तिलक शामिल हैं।
अनवर बताते हैं कि इसके बाद उनके मन में गीता के हर श्लोक का सारांश बना, जिसे उन्होंने कविता का रूप दिया।
वह कहते हैं, "पिछले 200 सालों के दौरान कविता के रूप में गीता के करीब दो दर्जन अनुवाद हुए हैं, पर पुराने ज़माने की उर्दू में फ़ारसी का असर ज़्यादा होता था।"
कर्मयोग का संदेश
अनवर कहते हैं, "गीता का एक अन्य उर्दू अनुवाद ख़्वाज़ा दिल मोहम्मद का है, जो पंजाब में काफ़ी मशहूर हुई। मगर वह आसान उर्दू में नहीं थी, इसलिए उत्तर भारत में लोकप्रिय नहीं हो सकी।"
गीता के कर्मयोग को अनवर ने अपनी शायरी में कुछ यूं पेश किया है-
गीता पर अनवर की शायरी
नहीं तेरा जग में कोई कारोबार, अमल के ही ऊपर तेरा अख्तियार।
अमल जिसमें फल की भी ख्वाहिश न हो, अमल जिसकी कोई नुमाइश न हो।
अमल छोड़ देने की ज़िद भी न कर, तू इस रास्ते से कभी मत गुज़र।
धनंजय तू रिश्तों से मुंह मोड़ ले, है जो भी ताल्लुक उसे तोड़ ले।
फ़रायज़ और आमाल में रब्त रख, सदा सब्र कर और सदा ज़ब्त रख।
तवाज़ुन का ही नाम तो योग है, यही तो ख़ुद अपना भी सहयोग है।