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कैग के पद पर शर्मा की नियुक्ति को एक और चुनौती
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Tue, 04 Jun 2013 01:27 AM IST
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भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी शशिकांत शर्मा को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) नियुक्त किए जाने के खिलाफ कई प्रमुख पूर्व नौकरशाहों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
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याचिका में कहा गया है कि शर्मा को नियुक्त करके केंद्र सरकार ने मनमानी की जिससे इस नियुक्ति में पारदर्शिता का अभाव रहा है। सर्वोच्च अदालत में शशिकांत शर्मा को कैग नियुक्त किए जाने के खिलाफ यह दूसरी जनहित याचिका है।
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वकील मनोहर लाल शर्मा ने शर्मा के पदभार ग्रहण करने के दिन ही 23 मई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके उनकी नियुक्ति को अवैध करार देने की अदालत से गुजारिश की थी। सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई का भरोसा दे चुका है।
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अब पूर्व निर्वाचन आयुक्त एन. गोपालास्वामी, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल आर एच तहिलयानी और एडमिरल एल रामदास, पूर्व डिप्टी सीएजी बीपी माथुर, तमाम मंत्रालयों में सचिव के पद से रिटायर्ड हुए कमलकांत जसवाल, रामास्वामी आर अय्यर तथा ईएएस सरमा तथा भारतीय लेखा सेवा के पूर्व अधिकारी एस कृष्णन और पूर्व आईएएस एमजी देवाश्याम ने संयुक्त रूप से सीएजी के पद पर शर्मा की नियुक्ति को चुनौती दी है। याचिका वकील प्रशांत भूषण ने दायर की है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय में पिछले दस साल के दौरान अहम पदों पर रह चुके शर्मा के कार्यकाल में कई विवादास्पद सौदे हुए। रक्षा मंत्रालय में महानिदेशक (अधिग्रहण) के रूप में उनकी ओर से की गई खरीद फरोख्त संदेह के घेरे में है।
एंग्लो-इटालियन फर्म अगस्ता वेस्टलैंड से भारतीय वायु सेना के लिए 12 वीवीआईपी चॉपर्स 3500 करोड़ में खरीदे गए। इटली के जांचकर्ताओं के अनुसार इस सौदे में 350 करोड़ रुपये की दलाली दी गई।
इसके अलावा रूस की सेना की ओर से बेकार करार दिए गए एडमिरल गोर्शकोव का नाम बदलकर आईएनएस विक्रमादित्य के नाम से खरीदा गया। यह पोत अभी तक भारत के पास नहीं आया है।
टाट्रा ट्रक डील भी शर्मा के कार्यकाल में हुई थी। इन प्रमुख रक्षा सौदों की स्वीकृति शर्मा ने की इसलिए उनकी नियुक्ति से हितों का टकराव हो सकता है।
सीएजी एकल सदस्य वाली संस्था है। ऑडिट के समय सीएजी इन सभी सौदों से अपने आप को अलग नहीं कर सकते।
याचिका में मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया है। थॉमस की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया था।
याचिका में यह भी कहा गया है कि सीएजी का पद संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन फिर भी इस अहम पद की नियुक्ति के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। सरकार ने सूचना का अधिकार कानून के तहत दिए जवाब में भी कहा है कि कैग के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है।
इस महत्वपूर्ण पद के लिए किसी तरह का नियम-कायदा नहीं होना ठीक नहीं है। महालेखा परीक्षक अधिनियम, 1971 तथा संविधान के तहत भी सरकार ने सीएजी की चयन प्रक्रिया तय नहीं की है। सरकार अपने चहेते को सीएजी नियुक्त कर सकती है। इस तरह की नियुक्ति लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि 1976 बैच के बिहार कैडर के आईएएस शशिकांत शर्मा रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव और रक्षा सचिव रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में हुए खरीद-फरोख्त का ऑडिट होना है। उनके कार्यकाल में हुए अगस्ता वेस्टलैंड चॉपर की जांच सीबीआई कर रही है।
सौदे में करोड़ों रुपये की दलाली का पता लगाया जा रहा है। कैग के पद पर वह उन सौदों का ऑडिट करेंगे जो उन्होंने खुद किए। अदालत से आग्रह किया गया है कि शर्मा की नियुक्ति रद्द की जाए।
सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की गई है कि सीएजी की नियुक्ति के लिए पारदर्शी व्यवस्था कायम की जाए। चयन समिति का गठन किया जाए जिससे उपयुक्त व्यक्ति को ही इस पद पर बैठाया जा सके।