मीडिया का विकलांग-श्रद्धा काल
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इक्कीसवीं सदी के जीवन में हर तरफ़ अर्थ प्रबल है। अपने हर अर्थ में। सार्थक स्नेह, सार्थक घृणा, सार्थक याचना और सार्थक क्रोध। इनका प्रस्फुटन और प्रतिफल आज की सामाजिक-राजनीतिक हक़ीक़त है। पहले शायद ऐसा नहीं था, या कम होता था, कि उधर ध्यान देने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई।
उन दिनों, विकटतम स्थितियों में भी ले-देकर दो भाव मुख्य रूप से सामने आते थे- याचना और क्रोध। उन्हीं से काम चल जाता था। हालांकि उनका भी कारण होता था। कभी तात्कालिक, कभी भविष्यकामी।
गोस्वामी तुलसीदास ने दोनों भावों को एक चौपाई में समेट दिया। दृश्य यह था कि राजा रामचंद्रजी समुद्र के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं और रास्ता मांग रहे हैं। तीन दिन तक अनुनय-विनय। पर समुद्र न टस, न मस। तब उन्हें क्रोध आया। बोले, 'भय बिन होय न प्रीति।'
उसके बाद काम बन गया। रास्ता निकल आया।
आपातकाल का काल
रेलगाड़ियां वक़्त पर चलने लगीं, लोग समय से पहले दफ़्तर पहुंचने लगे, अनुशासन 'पर्व' हो गया, संत घुटनों के बल बैठ गए।
मरखने बैल की तरह सींग डुलाती जमातें और इदारे दुम दबाए नज़र आने लगे। जहां-तहां सींग मारने वाले प्रेस का बड़ा हिस्सा बिछ-बिछ गया। जो नहीं बिछा, बिछा दिया गया।
भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी तब विपक्ष के बड़कऊ नेता थे। दीये में तेल डालकर रोशनी की, तो दिखा कि हो क्या रहा था। उसी वक़्त उनके जीवन की सबसे सार्थक उक्ति बाहर आई। कहा, 'उनसे झुकने को कहा गया था, वे रेंगने लगे.'
तब के प्रेस और आज के मीडिया में बहुत दीन-ईमान की तलाश शायद हमेशा विफल हो, लेकिन स्वागताकांक्षी प्रेस का पलक-पाँवड़े बिछाने की जगह डर के मारे ख़ुद बिछ जाना मार्गदर्शक जी को अखर गया। किसी ज़माने में वे खुद अख़बारनवीस रहे थे, शायद इसलिए।
चौथा खंभा
अखरा वह दूसरों को भी। इसलिए कि वे प्रेस को निहायत ताक़तवर चौथा खंभा माने बैठे थे। समझते थे कि वह वक़्त की आवाज़ है, उसका हाथ समाज की नब्ज़ पर है। वह बिक नहीं सकता, ख़रीदा नहीं जा सकता। जो क़िस्से उन्होंने पढ़े-सुने थे, सब इसी की पुष्टि करते थे। उस दौर में ज़्यादातर पत्रकार 'झोलाछाप' होते थे। उन्हें इल्म नहीं था कि झोले का वज़न बढ़ा तो वे झुक जाएंगे।
यह तस्वीर और बदशक्ल हुई, आर्थिक उदारीकरण के बाद। चाहे अख़बार हो या टेलीविज़न। बड़ा प्रेस कार्पोरेट घरानों का बड़ा व्यापार बन गया। छोटा लस्टम-पस्टम होकर रह गया। मरणासन्न। इसने ख़रीद-फ़रोख़्त को और आसान बना दिया। आवाज़ों में विचलित करने वाली गर्दभ-राग सरीखी सामूहिक एकरूपता और उन्माद पैदा हो गया।
आभासी मीडिया पर कुछ अलग आवाज़ें सुनने को मिलती हैं, लेकिन बाज़ार उनके दरवाज़े तक पहुंच गया है। सांकलें पीटी जा रही हैं। कुछ लपककर दरवाज़ा ख़ुद खोल देते हैं, जैसे इसी का इंतज़ार कर रहे हों। जो नहीं खुलते उनके लिए जेल के दरवाज़े खुल सकते हैं।
वैसे यह अब क़रीब-क़रीब घोषित और स्थापित सत्य है कि उस दुनिया में सब पाक-साफ़ नहीं है। आंकड़े बिकते हैं और ख़रीदे जाते हैं। संख्या अंततः शुद्ध व्यापार है। यानी कि कुल मिलाकर आभासी दुनिया से उम्मीद केवल उसके कुटीर उद्योग तक सीमित है।
मामला कुछ दिलचस्प इसलिए भी है कि अंतिम परिणाम को छोड़कर वहां सबकुछ आभासी है। आभासी फ़ौजें, आभासी तलवारें, आभासी तीर-कमान। पर ख़तरा वास्तविक महसूस होता है क्योंकि नतीजे वास्तविक हो जाते हैं। तब लगता है कि प्रेम, नफ़रत, विनय या क्रोध क्या वाकई अकारण हैं? क्या यह सब सचमुच अचानक हो रहा है, अनियोजित है?
समाज और राजनीति
हालात इस क़दर अलग नज़र आते हैं कि लगता है गोसाईंजी की श्रद्धा की टांग टूट गई है। समाज और राजनीति उनके ज्ञान से आगे चली गई है। 'बोले राम सकोप' की अब आवश्यकता नहीं है। डर एक ग़ैरज़रूरी जिंस है। कोई फ़रमान या क़ानून नहीं है कि 'कोई न सर उठा के चले', सब ऐसे ही सिर झुकाए हुए हैं। यह मीडिया का विकलांग-श्रद्धा काल है.
वे दूरदर्शी लोग हैं। इस लोक से आगे देख रहे हैं। यहां कुछ बना नहीं, अविरल भक्ति से शायद परलोक सुधर जाए।एक बार गुणगान से काम नहीं चलता, इसलिए बार-बार नमन कि तब न सुना हो तो अब सुन लें.
नतमस्तक हैं, जैसे नवरात्र में पाठ कर रहे हों, 'नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः.'
'कबहुं तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान.'