मात को उनकी मगर मात न लिखने पाऊं
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मीडिया का एक जुमला था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विजय रथ पर सवार हैं। मई 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली असाधारण जीत के बाद यह धारणा बनी थी कि वे जीत का नया व्याकरण रचने जा रहे हैं। लेकिन इस कथित विजय रथ को लगातार दूसरी बार रोक दिया गया है।
पहले दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने उनकी पार्टी भाजपा को धूल चटाई। यहां भाजपा को 70 में से सिर्फ तीन सीटें मिल सकीं। अब बिहार में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर भाजपा को सत्ता में आने से रोक दिया है। यहां भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है।
जाहिर है कि विजय रथ का जुमला अब नहीं उछाला जा सकेगा। कम से कम पश्चिम बंगाल, पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में तो हरगिज नहीं। लेकिन क्या भाजपा की इस हार के बाद मीडिया कह/लिख पाएगा कि नरेंद्र मोदी की करारी हार हो गई है?
नरेंद्र मोदी को करना पड़ेगा आत्मावलोकन
यह कोई नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दो अलग इकाइयां हैं। माना जाता है कि अमित शाह दरअसल नरेंद्र मोदी के सेनापति हैं। बिहार चुनावों के बाद वह समय आया है जब नरेंद्र मोदी को आत्मावलोकन करना पड़ेगा।
यह उम्मीद करना बेमानी है कि नरेंद्र मोदी इस हार की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। ऐसा भारतीय राजनीति में कम ही होता है। संयोगवश ताजा उदाहरण नीतीश का ही है जब लोकसभा की हार के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ा था।
बिहार के परिणामों के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया है, "हमेशा याद रखिए कि जीत पार्टी नेतृत्व की होती है और हार पार्टी की। यह हर पार्टी पर लागू है।"
भाजपा ने तो चुनाव के दौरान ही जमीनी हकीकत समझने के बाद सफाई देना शुरु कर दिया था कि इस चुनाव के नतीजों को केंद्र सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह के रूप में न देखा जाए। यह वही वाक्य है जिसे लोग कांग्रेस की ओर से सुनते आए हैं। जवाब में भाजपा कहती थी कि यह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हार है। जीत होती तो वह मोदी की जीत होती, ठीक उसी तरह जिस तरह कांग्रेस की जीत सोनिया गांधी की जीत होती थी।
क्यों है यह मोदी की हार?
लेकिन सच कहा जाए तो यह दरअसल नरेंद्र मोदी की ही हार है। नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से बिहार में जो ताकत लगाई उसे किसी भी प्रधानमंत्री के लिए अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। उन्होंने अकेले 30 रैलियां कीं। जबकि कोई 20 कैबिनेट मंत्रियों के साथ भाजपा ने लगभग 900 रैलियां कीं।
अमित शाह पूरे समय बिहार में जमे रहे। भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद पहली बार हुआ होगा कि किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष ने किसी राज्य के चुनाव में इतनी ताकत लगाई हो।
अब विश्लेषण होगा कि भाजपा की हार की वजह आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण वाला बयान है, बीफ को लेकर दादरी में की गई हत्या और इस पर भाजपा की प्रतिक्रिया मुद्दा है, असहिष्णुता के मसले पर बुद्धिजीवियों का प्रतिरोध है या फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों की नाकामी?
लेकिन इसी समय एक विश्लेषण भी जरूरी है कि नरेंद्र मोदी की रणनीति क्यों विफल हुई?
कहां हुई चूक?
पहला यह कि उन्होंने नीतीश कुमार के कामकाज और उनके कार्यकाल में हुए विकास के आकलन में गलती की। इससे हुआ यह कि उन्होंने एक वास्तविक विकास की तुलना अपने विकास के नारे से कर ली। नीतीश का विकास तो लोगों ने देख लिया है लेकिन मोदी जी का विकास अभी धरातल में किसी ने देखा नहीं है।
दूसरा यह कि नरेंद्र मोदी भूल गए कि उन्होंने लोकसभा में जनता से क्या वादे किए थे। बिहार के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने उनमें से किसी मुद्दे का जिक्र नहीं किया। चाहे वह अच्छे दिन हों, कालाधन हो या फिर सबका साथ सबका विकास हो। उल्टे यह हुआ कि प्रधानमंत्री का हर बयान सबको बांटने वाला दिखा। और यह महज संयोग नहीं कि भाजपा की ओर से आ रहे विज्ञापनों में भी यही दिख रहा था।
तीसरा यह कि अमित शाह सहित नरेंद्र मोदी के सभी सिपहसलार भूल कर बैठे कि वे बिहार में गुजरात या उत्तर प्रदेश की तरह मतों का ध्रुवीकरण कर सकते हैं। वे शायद समझ नहीं पाए कि जाति बिहार की सच्चाई है और वहां यह धर्म से ज्यादा बड़ा 'फैक्टर' है। बिहार के परिणामों ने दिखा दिया कि मुसलमानों का नाम लेकर हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने कोशिशें वहां सफल नहीं हो सकतीं।
चौथा यह कि जिस समय देश में लेखक, कलाकार, फिल्मकार और दूसरे बुद्धिजीवी देश में राजनीतिक असहिष्णुता की बात कर रहे थे उस समय नरेंद्र मोदी के बयानवीरों को यह समझ में नहीं आया कि इस पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। साफ दिखता है कि उनके बयानों ने उल्टा असर डाला है।
बहुत से राजनीतिक टीकाकार आकलन कर रहे हैं कि अब भाजपा की राजनीति बदलेगी लेकिन समय बताएगा कि बिहार के परिणामों ने क्या बदला, लेकिन जब भी बिहार का चुनाव और नरेंद्र मोदी का जिक्र होगा तो राजेश रेड्डी का शेर याद आएगा।।।।
जीत पर उनकी लगा दूं मैं कसीदों की झड़ी
मात को उनकी मगर मात न लिखने पाऊं