मोदी मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु हैं शाह
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अगर इस चुनाव में नरेंद्र मोदी के बाद किसी की केंद्रीय भूमिका है तो वो अमित शाह की है। भारतीय जनता पार्टी में ये ऐलान पहले हुआ था कि अमित शाह उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालेंगे।
पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का नाम आधिकारिक तौर पर बाद में आया था। प्रधानमंत्री पद के लिए उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता था।
ऐसे में नरेंद्र मोदी इन सीटों को न किस्मत पर छोड़ सकते थे, न पार्टी की प्रदेश इकाई पर। अमित शाह इस वक़्त पार्टी के चुनाव अभियान में दूसरे सबसे बड़े पात्र हैं। और चुनावी रणनीति के हिसाब से सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनकी है।
चुनावी चौपड़ पर हर बात घूम फिर कर उत्तर प्रदेश पर आती है। यह प्रदेश गांधीनगर से दिल्ली का रास्ता तय भी करवा सकता है और रोक भी सकता है। जबकि भाजपा का प्रदेश में बुरा हाल था।
बाबरी विवाद के बाद?
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बाद 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उतर प्रदेश में अपना मत प्रतिशत बढ़ाते हुए 30% का आंकड़ा पार कर लिया था, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी चौथे स्थान पर रही थी और नेताओं के हौसले पस्त थे और पार्टी से जुड़े लोग अपने-अपने जुगाड़ जमाने में लगे थे।
भीतरघात आम बात थी और सभी दिल्ली में हाई कमान से संपर्क में रहने का दम भरते थे। सिमटते जनाधार वाले परिदृश्य का न तो कोई बड़ा नेता ज़िम्मेदार था, न गुनहगार। और न ही कोई यह पहल करने वाला कि पार्टी में फिर से जान कैसे फूंकी जा सकती है।
शायद पार्टी की हालात की तुलना गुजरात भाजपा के उन दिनों से की जा सकती थी, जब नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकालकर गांधीनगर भेजा गया था। जून, 2013 से अमित शाह का डेरा लखनऊ में लग गया।
शुरू में उत्तर प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेताओं के ये पल्ले ही नहीं पड़ा कि इसका क्या मतलब है। पर बहुत देर नहीं लगी।
जसवंत सिंह मामले पर
अमित शाह पर करीब से नज़र रखने वाले कई लोगों ने मुझे ये भी बताया कि कैसे वो दूसरों की कम सुनते हैं और वही करते हैं जो उनके मन को भाता है। उनकी पत्रकारों से औपचारिक बातचीत हमेशा बहुत सीमित और संतुलित रहती है।
जसवंत सिंह के निष्कासन के सवाल पर उनका जवाब था, "जब किसी पार्टी का सत्ता में आना तय हो जाता है तो टिकट पाने वालों की कतार लंबी हो जाती है।"
माना कि जसवंत सिंह इससे पहले शायद जीतने के अभिप्राय से दार्जिलिंग सीट पर चले गए थे और 2014 में राजस्थान लौटना चाह रहे थे, लेकिन उनके क़द के नेता के लिए 'कतार' जैसी मिसाल देना अपने आप में बड़ा संकेत देता है।
भाजपा की विरोधी पार्टियों के नेता इसी बात को दोहराते हैं कि अमित शाह के आने के बाद से प्रदेश के मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण बढ़ा है। हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचार के दौरान उनके 'तीखे' भाषणों पर विपक्षी दल चुनाव आयोग तक पहुंच भी चुके हैं।
यूपी की सबसे बड़ी दावेदार पार्टी
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता और विधायक अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा, "अमित शाह को भाजपा का हर नेता प्रदेश में पूरी तरह स्वीकार कर लेगा, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपको कई ज़िलों के वरिष्ठतम भाजपा नेताओं के नाम बता सकता हूं जो उनसे नाराज़ बैठे हैं। टिकट बंटवारे में अमित शाह पूरी तरह नाकाम रहे हैं और चुनाव निकट आते ही उनकी रणनीति भी साफ़ दिखने लगी है।"
अमित शाह इस वक़्त उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्रीय चरित्र हैं। इसकी सीधी वज़ह यही है कि पार्टी अब पहले की तरह अराजक, विभाजित, नेतृत्वविहीन नहीं रही। अमित शाह यह परिवर्तन लेकर आए हैं, जो कुछ चुनावी सर्वेक्षणों में दिखलाई देता है।
भारतीय जनता पार्टी सबसे ज्यादा सीटों वाले प्रदेश में किसी भी और पार्टी के मुकाबले सबसे गंभीर दावेदार बन कर उभरी है। उस राज्य में जहां कांग्रेस, समाजवाद और दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे मुकाबिल हैं।
अमित शाह का सफ़र
1983-------छात्र जीवन के दौरान राजनीति से जुड़ाव और एबीवीपी में शामिल हुए। 80 के दशक में उन्होंने स्टॉक ब्रोकर का काम भी शुरू किया था। इसी दशक के आखिर में उनकी मुलाकात नरेंद्र मोदी से हुई।
1991-------लालकृष्ण आडवाणी के लिए चुनाव प्रचार किया।
1995-------गुजरात राज्य वित्तीय निगम के चेयरमैन बने।
1998-------सरखेज विधानसभा उपचुनाव में पहली बार विधायक बने।
2002-------गुजरात के गृह राज्य मंत्री बने।
2005-------कथित फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन की हत्या।
2009-------गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन बने।
2010-------कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में गिरफ्तारी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस शर्त पर ज़मानत दी कि वे गुजरात से दूर रहेंगे।
2012-------गुजरात जाने पर लगाई गई रोक हटा ली गई।