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अमेरिका की दादागिरी, नई टेक्नोलॉजी के लिए बना रहा दबाव
दिल्ली
Updated Thu, 12 Sep 2013 04:59 PM IST
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अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वो जल्दी से जल्दी मल्टीलेटरल मॉनिट्रयल प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करे।
रेफ्रीजेरेशन के लिए प्रयोग होने वाली गैसों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए अमेरिका मल्टीलेटरल मॉनिट्रयल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रहा है।
अगर भारत इस समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है तो कई अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत का बहुत बड़ा बाजार खुल जाएगा।
क्योंकि समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत को रेफ्रीजेरेशन में इस्तेमाल होने वाली नई टेक्नोलॉजी को खरीदना होगा।
इस नई टेक्नोलॉजी का पेंटेट भी अमेरिकी कंपनियों के पास है।
द हिंदू के मुताबिक क्लाइमेंट चेंज पर अमेरिका के राजदूत टॉड स्टर्न ने भारतीय अधिकारियों से कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा से पहले ही इस मुद्दे पर अधिकारिक स्तर पर सुलझा लिया जाना चाहिए।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा सीधे ही इस मुद्दे को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने उठाएंगे।
स्टर्न ने भारतीय अधिकारियों के साथ हुई बैठक में कहा कि यह समझौता अमेरिका के प्रशासन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए व्यक्तिगत तौर पर जरूरी है।
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इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय दोनों ने ही इस तरह के समझौते का विरोध किया है।
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने भी पहले इस तरह के समझौते का विरोध किया था।
नई टेक्नोलॉजी कुछ ही चुनिंदा अमेरिकी बिजनेस घरानों के पास है।
साथ ही इसकी लागत वर्तमान में प्रयोग होने वाली टेक्नोलॉजी की लागत से 20 गुना अधिक है।
दोनों मंत्रालयों ने पहले ही भारत सरकार को आगाह किया है कि अगर यह समझौता होता है तो डिफेंस इक्विपमेंट, सबमरीन और एयरक्रॉफ्ट जो रेफ्रीजेरेंट गैस प्रयोग करते हैं, उन पर प्रभाव पड़ेगा।
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रेफ्रीजेरेशन के लिए प्रयोग होने वाली गैसों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए अमेरिका मल्टीलेटरल मॉनिट्रयल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रहा है।
अगर भारत इस समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है तो कई अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत का बहुत बड़ा बाजार खुल जाएगा।
क्योंकि समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत को रेफ्रीजेरेशन में इस्तेमाल होने वाली नई टेक्नोलॉजी को खरीदना होगा।
इस नई टेक्नोलॉजी का पेंटेट भी अमेरिकी कंपनियों के पास है।
द हिंदू के मुताबिक क्लाइमेंट चेंज पर अमेरिका के राजदूत टॉड स्टर्न ने भारतीय अधिकारियों से कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा से पहले ही इस मुद्दे पर अधिकारिक स्तर पर सुलझा लिया जाना चाहिए।
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अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा सीधे ही इस मुद्दे को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने उठाएंगे।
स्टर्न ने भारतीय अधिकारियों के साथ हुई बैठक में कहा कि यह समझौता अमेरिका के प्रशासन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए व्यक्तिगत तौर पर जरूरी है।
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इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय दोनों ने ही इस तरह के समझौते का विरोध किया है।
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने भी पहले इस तरह के समझौते का विरोध किया था।
नई टेक्नोलॉजी कुछ ही चुनिंदा अमेरिकी बिजनेस घरानों के पास है।
साथ ही इसकी लागत वर्तमान में प्रयोग होने वाली टेक्नोलॉजी की लागत से 20 गुना अधिक है।
दोनों मंत्रालयों ने पहले ही भारत सरकार को आगाह किया है कि अगर यह समझौता होता है तो डिफेंस इक्विपमेंट, सबमरीन और एयरक्रॉफ्ट जो रेफ्रीजेरेंट गैस प्रयोग करते हैं, उन पर प्रभाव पड़ेगा।