पाकिस्तान का 'पैकेज' रोकेगा अमेरिका?
पाकिस्तान के चरमपंथी गुटों पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और भारतीय थल सेनाध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग के बयान भारत और दक्षिण एशिया में सुरक्षा की चुनौतियों की हककत बयां करते हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने इस्लामाबाद में कहा कि पाकिस्तान को उन चरमपंथी गुटों का मुकाबला करना होगा जिनसे अफगानिस्तान, भारत और अमेरिका के हितों को खतरा है।
वहीं, जनरल सुहाग का दावा है कि भारतीय सेना ने पिछले साल 104 आतंकवादियों को पकड़ा। सुहाग ने यह भी कहा है कि भारत सरकार और सेना ने जो नई नीति बनाई है उसके मुताबिक सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से हो रही फायरिंग का कड़ा जवाब देना है।
जाहिर है, इसके बाद पाकिस्तान भी भारत को लेकर अपनी सुरक्षा नीति की समीक्षा करेगा। जहां तक केरी का बयान है तो उन्होंने इस्लामाबाद में अपने बहुत सोचे-समझे शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी है।
अमेरिकी रुख पर नजर
केरी ने कहा, "पाकिस्तानी और अफगान तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, लश्करे-तैयबा और दूसरे समूहों से पाकिस्तान, उसके पड़ोसियों और अमेरिका को खतरा है।" देखना होगा कि जब केरी साहब लौटकर अमेरिका जाएंगे और पाकिस्तान को आर्थिक मदद पर फैसले का वक्त आएगा, तब रुख क्या होगा।
देखना होगा कि क्या अमेरिका, पाकिस्तान को यह प्रमाण पत्र देने को तैयार है कि वह दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ सही क़दम उठा रहा है। या फिर वह राजनीतिक रूप से पाकिस्तान को इसमें कोई छूट देता है। हालांकि अमेरिका के लिए ये कोई नई बात नहीं है।
1991-1992 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर भी पाकिस्तान की समीक्षा करते हुए इस निर्णय पर पहुंचे थे कि पाकिस्तानी सरकार चरमपंथियों को मदद कर रही है।
लेकिन उसके बाद अब तक अमेरिका तय नहीं कर पाया है कि दहशतगर्दी के मुद्दे पर वह पाकिस्तानी सेना के साथ कैसी नीति अख्तियार करे।
हालांकि इस समय पाकिस्तान में पेशावर और पेरिस की घटनाओं के बाद इस्लामी चरमपंथ को लेकर नई बहस शुरू हुई है और दुनियाभर की सरकारें अपनी नीतियों की समीक्षा कर रही हैं।