आसान नहीं होगी अमर सिंह की सपा में वापसी

लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी Updated Sun, 04 Nov 2012 09:56 AM IST
amar's returning in SP would not be so easy
अमर सिंह पर सपा सरकार की नरमी ने यूपी की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। अटकले हैं कि अमर की सपा में वापसी हो सकती है। हालात भी इन अटकलों को मजबूत आधार दे रहे हैं। लेकिन पुरानी घटनाएं और सपा के सियासी समीकरणों के चलते यह काम बहुत आसान नहीं दिखता। आजम और अमर के जिस तरह 36 के रिश्ते हैं उनको देखते हुए मुलायम के लिए यह फैसला करना सरल नहीं है।

अमर को लेने का मतलब आजम को नाराज करना होगा। इसके अलावा सपा के आम कार्यकर्ताओं में भी अमर सिंह को लेकर कोई आकर्षण नहीं बचा है। जमीनी कार्यकर्ता अमर सिंह की वापसी के खिलाफ बताए जाते हैं। ऐसी हालत में लोकसभा चुनाव की चौखट पर खड़ी सपा मुसलिम वोटों के समीकरण और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के मद्देनजर शायद ही कोई बड़ा खतरा मोल ले।

अमर को तवज्जो से नाराज आजम ने छोड़ी थी सपा
आजम खां और मुलायम के बीच रिश्तों में दरार पैदा होने की असली वजह अमर सिंह ही थे। अमर को पार्टी में मिल रही तवज्जो और अनिल अंबानी जैसे पूंजीपतियों तथा मायानगरी के लोगों के पार्टी में बढ़ते वर्चस्व से नाराज होकर ही सपा से अलग हुए थे।

सपा छोड़ते वक्त आजम ने कहा भी था, ‘पंच सितारा वाले नेता ने मेरे सीधे-साधे और जमीनी साथी को हवा में उड़ा दिया है। इसलिए जमीन पर रहने वाले मुझ जैसे लोगों का हवा वाले नेताओं के साथ क्या काम।’ आजम खां फिलहाल हज यात्रा पर हैं। उनका रुख तो वापस लौटने पर ही पता चलेगा।

इन हालात की अनदेखी भी नहीं हो सकती
अमर और आजम के तल्ख रिश्तों के बावजूद वापसी की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी व आजम के रिश्ते भी दुश्मनों जैसे हैं। आजम बुखारी के दामाद को विधान परिषद भेजने के विरोधी थे। लेकिन मुलायम ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया। ‘जौहर विश्वविद्यालय’ को लेकर आजम ने राज्यपाल पर निशाना साधा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अगले ही दिन राजभवन जाकर खेद जताना पड़ा।

आजम ने कांग्रेस पर भी निशाना साधकर सपा व कांग्रेस के रिश्तों को तल्ख किया। मेरठ का प्रभार वापस होने से आजम ने मंत्री पद से त्यागपत्र तक की पेशकश की थी। वह लखनऊ में होते हुए रोजा इफ्तार में मुख्यमंत्री आवास नहीं गए। उधर, सपा में कई मौकों पर अहमद हसन को मुसलिम चेहरे के रूप में अहमियत दी गई।

शुक्रवार को पार्टी मुख्यालय में बैठक में आजम के धुर विरोधी नेता व राज्यमंत्री हाजी रियाज अहमद को मुलायम व अखिलेश के साथ बोलने का मौका दिया गया। इससे इन अटकलों को आधार मिल रहा है कि अमर सिंह भी सपा में आ सकते हैं। आजम जब बुखारी और रियाज को बरदाश्त कर सकते हैं तो अमर को क्यों नहीं।

यों चला था बयानों का सिलसिला
‘आजम खां मुलायम सिंह की कमजोरी हैं। पर, मैं उन्हें सहन नहीं कर सकता। जिस दिन आजिज आ जाऊंगा सपा छोड़ दूंगा। आजम मुलायम सिंह यादव का दिल हैं। आजम के बिना पार्टी नहीं चल सकती। मैं तो मामूली कार्यकर्ता हूं। इसलिए मेरे न रहने से पार्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आजम खां किसी बारे में चाहे कहें या करें। उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, क्योंकि नेताजी का हुक्म है। -.अमर सिंह, 2010 में लखनऊ में एक सम्मेलन में।

‘काले धन पर पंच सितारा संस्कृति की राजनीति करने वालों का ऐसा ही हश्र होता है कि इस्तीफा विदेश से भेजना पड़ता है। सपा नेतृत्व को भी अब सोचने को मजबूर होना पड़ेगा कि वह अब वही काट रही है जो उसने बोया था। उम्मीद है कि अन्य दलों के लोग इस घटना से सीख लेंगे और अमर सिंह सरीखों को महत्व देने से पहले सोचेंगे।’ -आजम खां, अमर के त्यागपत्र पर।

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