अखिलेश यादवः पंक्चर हुई 'सरकार' की साइकिल
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2012 में जब मायावती को उत्तर प्रदेश की जनता ने नकारा और समाजवादी पार्टी को उम्मीद से अधिक जनादेश दिया तो प्रदेश की कमान सबसे युवा हाथों में सौंपी गई। चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी को जीत दिलाने के लिए अखिलेश यादव ने काफी मेहनत की थी। प्रदेशभर में साइकिल यात्राएं निकालकर उन्होंने युवा समर्थकों में जोश भरने का काम किया। अखिलेश की मेहनत का ही नतीजा था कि सपा को 2007 में 94 सीटों के मुकाबले 2012 में 224 सीटें मिलीं।
प्रदेश के लोग इस बात से खुश थे कि उन्हें पहली बार अब तक का सबसे युवा नेतृत्व मिला है। लेकिन लोगों को अखिलेश से जो उम्मीदें थीं उन्हें पूरा करने में वो नाकाम साबित हुए। कहने को समाजवादी पार्टी ने कमान तो युवा अखिलेश के हाथों में सौंपी लेकिन उन पर समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व हमेशा हावी रहा।
बसपा की सरकार में मायावती जहां मूर्तियां बनाने में व्यस्त रहीं तो सत्ता संभालते ही अखिलेश लोकप्रिय चुनावी वादे पूरे करने में जुट गए। एक तरफ अखिलेश छात्र-छात्राओं को लैपटॉप और टैबलेट बांटते रहे तो दूसरी तरफ प्रदेश की कानून-व्यवस्था चरमराती रही।
युवा सीएम के दामन पर दंगों का दाग
गद्दी संभालते ही अखिलेश की प्रशासनिक क्षमता की अग्निपरीक्षा का दौर भी शुरू हो गया। उनके कार्यकाल में अब तक छोटे-बड़े दंगों की सेंचुरी लग चुकी है। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगे तो समाजवादी सरकार के दामन पर एक बड़ा दाग लगा गए। अखिलेश सरकार इन दंगों को वक्त रहते रोकने में न केवल नाकाम रही बल्कि दंगा पीड़ितों के राहत और पुनर्वास को लेकर भी उंगलियां उठीं। दंगा पीड़ितों का मसला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और देश की सबसे बड़ी अदालत ने मुख्यमंत्री को कठघरे में खड़ा किया।
दंगा पीड़ितों को मुआवजे देने की सरकार की शर्तों पर भी सवाल उठे। कैंप में रह रहे लोगों के बारे में समाजवादी पार्टी के नेताओं ने कुछ आपत्तिजनक बयान भी दिया। इसका खामियाजा भी समाजवादी पार्टी को लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता।
जिस मुस्लिम वोट बैंक की बदौलत समाजवादी पार्टी की राजनीति आगे बढ़ी वो भी इन दंगों में अखिलेश सरकार के रवैये से खासा नाराज है। कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी अखिलेश सरकार की खिलाफत की और आगामी लोकसभा चुनावों में सबक सिखाने और समाजवादी पार्टी के बहिष्कार तक का ऐलान कर दिया।
उत्तर प्रदेश में ढाई मुख्यमंत्री?
यूपी में विपक्ष के नेता आरोप लगाते रहे हैं कि उत्तरप्रदेश की सरकार को ढाई मुख्यमंत्री चला रहे हैं। पूर्व समाजवादी नेता और अब यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा के निशाने पर तो मुलायम और अखिलेश हमेशा से रहे हैं। मुलायम और अखिलेश के खिलाफ तीखे तेवरों की वजह से ही उन्हें कांग्रेस में खास तवज्जो दी जाती है।
ढाई मुख्यमंत्री के जुमले के पीछे अखिलेश यादव की प्रशासनिक पकड़ नहीं होना माना जाता है। कहा जाता है समाजवादी पार्टी की सरकार में मुलायम की ही चलती है और उसके बाद वरिष्ठ मंत्री आजम खान का प्रभाव सरकार के हर एक फैसले में देखा जाता है।
विरोधी दलों के नेता कहते हैं कि अखिलेश, मुलायम और आजम खान के फैसलों पर केवल सहमति जताते हैं। और इस तरह अखिलेश यादव को केवल आधा मुख्यमंत्री कहा दिया जाता है।
अखिलेश की मजबूरी, दागी मंत्री हैं जरूरी?
समाजवादी पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश की कितनी चलती है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें दागी और बाहुबलि मंत्री राजा भैया को मंत्रिमंडल में बार-बार लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जिया उल हक हत्याकांड में नाम आने के बाद राजा भैया को मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था लेकिन सीबीआई से क्लीनचिट मिलने के बाद उन्हें फिर से मंत्री की कुर्सी थमा दी गई। हालांकि जिया की पत्नी अब भी मानती हैं कि उनके पति की हत्या में राजा भैया का हाथ है और समाजवादी पार्टी की सरकार ने राजा को फिर से मंत्री की कुर्सी सौंपकर उनके जख्मों पर नमक छिड़का है।
बसपा सुप्रीमो मायावती समाजवादी पार्टी की गुंडई को मुद्दा बनाती रही हैं। मायावती की सरकार से पहले मुलायम सरकार में इसी वजह से सपा को न केवल बदनामी झेलनी पड़ी थी बल्कि सत्ता से भी बेदखल होना पड़ा था। सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव गाहे-बगाहे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को गुंडई न करने की ताकीद करते रहे हैं लेकिन उन पर इस नसीहत का जरा भी असर दिखाई नहीं देता है।
मायावती एक बार फिर इसी मुद्दे को लेकर लोकसभा चुनाव में उतर रही हैं और उन्हें उम्मीद है कि कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर नाकाम साबित हो चुकी अखिलेश सरकार से तंग आ चुके लोग लोकसभा चुनाव में बसपा का समर्थन करेंगे।
बिगड़ती कानून व्यवस्था, टूटतीं उम्मीदें
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था शुरू से ही एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है। कोई भी सरकार रही हो इतने बड़े इलाके की कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखना एक बड़ी चुनौती रही है। आंकड़े बताते हैं कि मायावती के राज में कानून व्यवस्था इतनी खराब नहीं थी जितनी कि अखिलेश सरकार में है। अखिलेश सरकार के अब तक के कार्यकाल में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिन्होंने प्रदेश में लचर कानून व्यवस्था के सबूत दिए हैं।
कुंडा में डीएसपी जिया उल हक की हत्या और बनारस के डिप्टी जेलर अनिल त्यागी की हत्या ने बता दिया है कि उत्तर प्रदेश में कानून के रखवाले भी सुरक्षित नहीं है।
कुंडा में डीएसपी की हत्या के बाद ही इलाहाबाद में कुछ अराजक तत्वों ने एक इंसपेक्टर की उस समय हत्या कर दी जब उन्होंने गुंडों की गाड़ी का पीछा किया। विपक्षी दल बसपा और कांग्रेस का कहना है कि समाजवादी पार्टी की सरकार में कानून-व्यवस्था चौपट हो गई और सरकार ने समाजवादी पार्टी के नेताओं को गुंडई की खुली छूट दे रखी है।
दुर्गा नागपाल पर आजमाई अपनी शक्ति
आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में भी अखिलेश सरकार की खूब किरकिरी हुई। विपक्षी दलों और आम लोगों के तमाम दबाव के बावजूद सरकार ने अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया। नोएडा में पदस्थ आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को एक मस्जिद की दीवार गिराने के आरोप में सरकार ने सस्पेंड कर दिया।
सरकार की तरफ से कहा गया कि दुर्गा के कदम से सांप्रदायिक तनाव फैल सकता था लेकिन उस इलाके के थानेदार और फिर कलेक्टर ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी उसमें इस तरह की किसी भी आशंका को खारिज किया गया। इसके बावजूद सरकार ने अपनी गलती नहीं मानी। दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। हालांकि निलंबन के फैसले पर कोर्ट ने किसी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इस निलंबन का काफी विरोध हुआ और दुर्गा शक्ति नागपाल के समर्थन में कई जगह प्रदर्शन भी हुए। अखिलेश सरकार ने इस मुद्दे को नाक की लड़ाई बना लिया और इस पर पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया। सरकार ने दुर्गा को कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया। हालांकि बाद में सफाई देने के बाद उनकी बहाली कर दी गई लेकिन पूरे मसले पर अखिलेश सरकार की जमकर किरकिरी हुई।
नौकरियां खूब निकालीं, भर्ती एक नहीं
समाजवादी पार्टी ने सत्ता में आने से पहले बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया था। सरकार में आने के बाद उसे पूरा भी किया लेकिन तमाम विभागों की भर्तियों को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाने को लेकर बेरोजगारों में जमकर गुस्सा देखा गया। अखिलेश ने सत्ता में आते ही जितनी भर्तियां निकलीं वो किसी न किसी पेचीदगी की वजह से अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाईं।
72 हजार प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती का मसला तो अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इसके अलावा चाहे विज्ञान शिक्षकों की भर्ती का मसला हो या ग्राम विकास अधिकारियों की भर्ती। याचिकाओं, आपत्तियों और कोर्ट के चक्कर में अखिलेश सरकार अब तक एक भी भर्ती को अंजाम नहीं दे पाई है।
अखिलेश सरकार ने बेरोजगारों को सरकारी भत्ता देकर एक तरफ खुश किया तो उससे कहीं ज्यादा उन बेरोजगारों को नाराज कर दिया जिन्होंने एक-एक आवेदन पर दस हजार रुपए तक खर्च किए। किसी भी भर्ती को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाने की अखिलेश सरकार की नाकामी का खामियाजा समाजवादी पार्टी को लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।
सैफई का नाच बना गले की फांस
अपने गढ़ में जश्न का समाजवादी पार्टी का सालाना जलसा इस बार अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया। सैफई में वैसे तो ये आयोजन हर साल होता है लेकिन इस बार गलत वजहों से उसे कुछ ज्यादा सुर्खियां मिलीं। इस आयोजन में शिरकत करने आए बॉलीवुड के सितारे और उन पर हुए खर्चे को लेकर खूब बवाल हुआ।
आरोप लगे कि इस आयोजन में करीब दस करोड़ खर्च हुए लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश ने आरोपों को बकवास करार दिया और केवल एक करोड़ के खर्चे की बात कही। सलमान खान और माधुरी दीक्षित से सवाल किए जाने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भड़क गए।
पत्रकारों ने सलमान और माधुरी से उनके इस आयोजन में ऐसे समय नाचने पर सवाल उठाए जब दंगा पीड़ितों के लिए लगाए गए कैंप में ठंड से बच्चों की मौत हो रही थी। सैफई में सितारों की चमक-दमक भले ही समाजवादी पार्टी के गढ़ में उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा कर पाए लेकिन कैंपों में बच्चों की मौतों के वक्त ऐसे आयोजन पर नैतिक सवाल तो उठते ही हैं।